नई दिल्ली, 17 अक्टूबर।
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में इंटरनेट तक पहुंच और इसके उपयोग को संविधान के अनुच्छेद 21 तथा 19(1)(ए) के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया है। अदालत का कहना है कि यह अधिकार बच्चों सहित हर नागरिक को प्राप्त है और उन्हें इससे पूरी तरह वंचित करना अनुचित होगा। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे दोनों के समान रूप से हकदार हैं।
अदालत ने यह टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री को हटाने के तंत्र को मजबूत करने संबंधी निर्देश जारी करते समय की। शीर्ष अदालत ने माना कि इंटरनेट सूचना, सीखने और विचारों के आदान-प्रदान का बड़ा माध्यम है। विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों के बच्चों और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए यह शिक्षा और संवाद का एकमात्र जरिया बन जाता है। पुराने फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने डिजिटल एक्सेस को मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया।
पीठ ने बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने को गलत ठहराया। कोर्ट के अनुसार, कंपनियों की नाकामी के कारण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना समस्या के मूल को न समझने जैसा है। पूर्ण प्रतिबंध से बच्चे असुरक्षित और अनियंत्रित प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख कर सकते हैं तथा डर के कारण अपने साथ होने वाली ऑनलाइन गड़बड़ियों की जानकारी अभिभावकों को देने से कतरा सकते हैं। इसके अलावा उम्र सीमा तय करने के नाम पर होने वाली निगरानी से डेटा का दुरुपयोग हो सकता है।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह भी साफ किया कि सुरक्षा के लिए संतुलित उपाय आवश्यक हैं। अदालत ने सोशल मीडिया खातों के लिए 'चाइल्ड मोड', माता-पिता की सहमति, खातों को डिफ़ॉल्ट रूप से प्राइवेट रखने और अजनबियों के संदेशों को रोकने जैसे सुझाव दिए हैं। सरकार को हानिकारक सामग्री रोकने और पूर्ण राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने के निर्देश भी दिए गए हैं ताकि बाल यौन शोषण सामग्री को इंटरनेट से पूरी तरह हटाया जा सके।














