भोपाल, 19 अक्टूबर।
त्योहारी सीजन में सड़क पर सियासत से किसे नुकसान?
नवरात्रि, दशहरा और दीपावली हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहार हैं। इन त्योहारों से केवल मंदिरों में घंटियां नहीं बजतीं, बल्कि बाजारों की रौनक भी लौटती है। व्यापारी पूरे साल खरीदारी के इस सीजन की प्रतीक्षा करते हैं। दिल्ली केवल राजधानी नहीं है, बल्कि देश का सबसे बड़ा बिजनेस हब भी है।
पिछले सप्ताह राहुल गांधी के लगातार सड़कों पर आंदोलन करने से दिल्ली के व्यापारियों में भारी नाराजगी देखी गई। जंतर-मंतर पर रोजाना प्रदर्शन से कनॉट प्लेस, चांदनी चौक और करोलबाग तक के कारोबार पर असर पड़ा। ग्राहक बाजार आने से कतराने लगे। व्यापारी संगठनों ने तो जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थल की सूची से हटाने की मांग तक कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि विरोध प्रदर्शन के लिए नए स्थान तलाशने चाहिए।
अब सरकार ने जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के स्थलों की सूची से हटा दिया है। यह केवल प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है कि त्योहारी सीजन में सड़कों पर कब्जा कर आम हिंदू की आस्था और व्यापारी की रोजी-रोटी में बाधा नहीं बनने दी जाएगी। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी और उनके गठबंधन के सहयोगी अब त्योहारी सीजन में सड़कों पर आंदोलन करने से बचेंगे, क्योंकि जनता का मूड उत्सव का है, विरोध का नहीं।
राहुल गांधी पिछले कई महीनों से वोट चोरी का नैरेटिव बना रहे थे। उनका आरोप था कि चुनाव आयोग भारतीय जनता पार्टी के इशारे पर काम कर रहा है और मतदाता सूची से नाम काटे जा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए सड़कों पर मार्च किया, प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं और सुप्रीम कोर्ट तक का रुख किया। भाजपा तब तक उनके आरोपों को झूठा और अराजकतावादी बताकर बचाव कर रही थी, लेकिन जब राहुल गांधी का अभियान चरम पर पहुंचा, तब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 'सौ सुनार की, एक लोहार की' शैली में एक ही वार किया। उन्होंने राहुल गांधी के पूरे वोट चोरी अभियान को तुष्टिकरण का एजेंडा और घुसपैठिया बचाओ योजना घोषित कर दिया।
यह केवल एक बयान नहीं था, बल्कि नैरेटिव की पूरी दिशा बदलने वाला दांव था। राहुल गांधी जिसे वोट चोरी बता रहे थे, उसे अमित शाह ने घुसपैठियों को बचाने की कार्ययोजना बता दिया और यहीं से पूरी बहस का केंद्र बदल गया।
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर विपक्ष का आरोप था कि सरकार मुसलमानों के नाम मतदाता सूची से हटा रही है, लेकिन सरकार और चुनाव आयोग का तर्क बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि मतदाता सूची से केवल उन नामों को हटाया जा रहा है, जो भारत के नागरिक ही नहीं हैं। घुसपैठिए हर राज्य की समस्या हैं। असम, बंगाल, बिहार, दिल्ली और मुंबई, हर जगह अवैध रूप से रह रहे लोगों के कारण स्थानीय लोगों के रोजगार और संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। भाजपा इसके बहाने अपने हिंदू वोट बैंक को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश करती है कि वह उनके अधिकारों की रक्षा कर रही है।
बंगाल में एसआईआर के दौरान कई वीडियो वायरल हुए थे, जिनमें देखा गया था कि जांच शुरू होते ही कई लोग बांग्लादेश की ओर भाग रहे थे। इन वीडियो को घुसपैठ की समस्या की गंभीरता के प्रमाण के रूप में पेश किया गया। राहुल गांधी इसे वोट चोरी बता रहे हैं, जबकि अमित शाह इसे देश की सुरक्षा से जोड़ रहे हैं।
यह लड़ाई आज की नहीं है, बल्कि विचारधारा का बहुत पुराना संघर्ष है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दल दशकों से मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करते आए हैं, वहीं भाजपा शुरू से ही हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे पर खड़ी रही है। एनआरसी और सीएए का विरोध भी इसी कड़ी का हिस्सा था। एनआरसी और सीएए को घुसपैठियों की पहचान करने और प्रताड़ित हिंदुओं को नागरिकता देने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर भारत आए हिंदुओं को घुसपैठिया नहीं, बल्कि शरणार्थी के रूप में नागरिकता देने का कानून बनाया गया है, ताकि उन्हें सम्मानजनक जीवन मिल सके। कांग्रेस ने एनआरसी और सीएए, दोनों का विरोध किया था और आज एसआईआर का विरोध भी उसी वैचारिक लाइन पर है। भाजपा इसी को तुष्टिकरण बता रही है।
राजनीति में मैसेजिंग कैरम के खेल जैसी होती है। निशाना एक तरफ लगाया जाता है और गोटी दूसरी तरफ जाकर लगती है। राहुल गांधी ने वोट चोरी का निशाना चुनाव आयोग पर लगाया था, लेकिन अमित शाह ने उसकी दिशा बदलकर घुसपैठियों की ओर मोड़ दी। अब जनता के मन में यह सवाल है कि क्या राहुल गांधी सच में वोट चोरी के खिलाफ लड़ रहे हैं या घुसपैठियों के वोट बचाने के लिए लड़ रहे हैं? यह एक ऐसा सवाल है, जो सीधे हिंदू मतदाता के मन को छूता है। भाजपा के मुख्यमंत्री चुनावों में 'बंटोगे तो कटोगे' और '80-20' जैसे नारे इसी एजेंडे को स्थापित करने के लिए देते हैं। कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करती है, तो भाजपा भी अब हिंदू वोट बैंक के लिए खुलकर न केवल खड़ी होती है, बल्कि काम करती हुई भी दिखाई देती है।
एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। अदालत ने कहा है कि मतदाता सूची को शुद्ध करना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है। नई याचिकाओं में जो तकनीकी मुद्दे उठाए जा रहे हैं, उन पर भी अदालत जल्द निर्णय देगी। लेकिन राजनीतिक लड़ाई अदालत के फैसले से खत्म नहीं होगी। यह लड़ाई विचारधारा की है। एक विचारधारा पर कांग्रेस ने पचास साल से ज्यादा सरकार चलाई है, तो दूसरी विचारधारा पर भाजपा अब तीसरे कार्यकाल में है। यदि ध्रुवीकरण भाजपा को मजबूती दे रहा है, तो उसे वोट चोरी जैसे आरोपों से कमजोर नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के वोट चोरी अभियान को घुसपैठिया बचाओ कार्ययोजना बताना कोई आकस्मिक बयान नहीं है, बल्कि यह सोचा-समझा वैचारिक एजेंडा है। कश्मीर से धारा 370 हटाना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, समान नागरिक संहिता लागू करना और घुसपैठियों को देश से बाहर निकालना, ये चारों भाजपा के घोषित बुनियादी एजेंडे रहे हैं।
राहुल गांधी सहित पूरा विपक्ष एसआईआर को मुद्दा बनाकर भाजपा के ही ट्रैप में आ गया है, क्योंकि जैसे ही घुसपैठियों का मुद्दा उछलता है, वैसे ही हिंदू मतदाता एकजुट होने लगता है। राजनीति में हिंदुत्व की धारा ने घुसपैठियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देने वाली राजनीतिक धारा को संकट में डाल दिया है। राजनीतिक अस्तित्व को खतरे में देखकर कई दल अब वैचारिक नक्सलवाद की ओर बढ़ रहे हैं।
'सौ सुनार की, एक लोहार की' कहावत इस पूरे घटनाक्रम पर सटीक बैठती है। राहुल गांधी ने महीनों तक वोट चोरी का नैरेटिव बनाने के लिए सौ हथौड़े मारे, लेकिन अमित शाह ने एक ही वैचारिक हथौड़े से पूरे नैरेटिव को तुष्टिकरण और घुसपैठिया बचाओ अभियान में बदल दिया। अब लड़ाई वोट चोरी की नहीं, बल्कि इस सवाल पर आ गई है कि देश का नागरिक कौन है और घुसपैठिया कौन। यही भाजपा की सबसे बड़ी वैचारिक जीत है।













