वाशिंगटन, 19 अक्टूबर।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की नजरें वाशिंगटन की सैन्य रणनीति पर टिकी हैं। ईरान के परमाणु और ऊर्जा ठिकानों पर अमेरिका के सबसे शक्तिशाली गैर-परमाणु हथियार जीबीयू-43/बी, यानी ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’, से हमले की संभावना को लेकर चर्चाएं हो रही हैं। हालांकि, इसके इस्तेमाल की किसी योजना की आधिकारिक पुष्टि और अटकलों के बीच अंतर करना जरूरी है। सवाल केवल इस बम की विनाशकारी क्षमता का नहीं, बल्कि इसके संभावित भू-राजनीतिक परिणामों का भी है।
करीब 9,800 किलोग्राम वजनी इस बम में लगभग 8,500 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री होती है। वर्ष 2003 में इसके परीक्षण के बाद इसे अमेरिकी सैन्य शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यह जमीन से टकराने से पहले हवा में विस्फोट कर व्यापक क्षेत्र में दबाव और तबाही पैदा करता है। अमेरिका ने अप्रैल 2017 में अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के ठिकानों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया था। हालांकि, इसकी विनाशकारी क्षमता के साथ इसकी सीमाओं को समझना भी जरूरी है।
भूमिगत ठिकानों पर सीमित असर
मदर ऑफ ऑल बम्स को गहरे भूमिगत ठिकानों को भेदने के लिए विकसित नहीं किया गया है। इसकी प्रभावशीलता मुख्यतः खुले क्षेत्रों, सतह पर मौजूद सैन्य संरचनाओं और सुरंगों के प्रवेश द्वारों के आसपास अधिक हो सकती है। ईरान का फोर्डो परमाणु केंद्र पहाड़ के भीतर गहराई में स्थित है। ऐसे मजबूत भूमिगत ठिकानों के लिए अमेरिका के पास जीबीयू-57 जैसे विशेष बंकर भेदी बम भी हैं। इसलिए मदर ऑफ ऑल बम्स के इस्तेमाल की चर्चा के पीछे सैन्य कार्रवाई के साथ मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का उद्देश्य भी हो सकता है।
सैन्य रणनीति और घरेलू राजनीति
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के लिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दबाव बनाना रणनीतिक प्राथमिकता हो सकता है। इजरायल भी लंबे समय से इसे अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताता रहा है। ऐसे में अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन ईरान को बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश हो सकता है। लेकिन सैन्य दबाव हमेशा अपेक्षित परिणाम नहीं देता। हमले से ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, इसकी गारंटी नहीं है। इसके विपरीत, ईरान अपने कार्यक्रम को अधिक गोपनीय बनाने और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
भारत पर भी पड़ सकता है असर
किसी बड़े हमले का सबसे गंभीर आर्थिक प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य पर पड़ सकता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने पर कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित तेल से पूरा करता है। ऐसे में महंगा तेल परिवहन लागत, महंगाई, व्यापार संतुलन और आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ा सकता है। हालांकि, तेल की कीमतों में वास्तविक वृद्धि संघर्ष की अवधि और आपूर्ति पर उसके प्रभाव पर निर्भर करेगी।
क्षेत्रीय युद्ध का खतरा
ईरान जवाबी कार्रवाई कर सकता है। लेबनान, यमन और इराक में सक्रिय उसके सहयोगी संगठन भी संघर्ष को व्यापक बना सकते हैं। इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने निशाने पर आ सकते हैं। इससे सीमित हमला पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध का रूप ले सकता है। ऐसी स्थिति में नागरिकों की सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर संकट पैदा होगा।
‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रतीक जरूर है, लेकिन विनाश की क्षमता स्थायी शांति की गारंटी नहीं देती। ईरान जैसे विशाल और पहाड़ी देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के परिणाम दूरगामी हो सकते हैं। असली चुनौती हमला करना नहीं, बल्कि उसके बाद पैदा होने वाले संकट को संभालना है। बातचीत, प्रभावी कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय निगरानी ही ऐसे रास्ते हैं, जो पश्चिम एशिया को एक और अंतहीन युद्ध से बचा सकते हैं।














