भोपाल, 19 अक्टूबर।
मध्यप्रदेश सरकार ने अति प्रदूषणकारी उद्योगों को सामान्य औद्योगिक क्षेत्रों से बाहर रखने का निर्णय लिया है। यह उस लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा के विरुद्ध एक गंभीर हस्तक्षेप है, जो औद्योगिक नीति के नाम पर होती रही है। अब तक सामान्य औद्योगिक क्षेत्र की परिभाषा इतनी व्यापक थी कि उसमें सॉफ्टवेयर इकाई से लेकर चमड़ा उद्योग तक और ईंट भट्टे से लेकर खिलौना इकाई तक शामिल थे। इस घालमेल ने कई औद्योगिक क्षेत्रों को प्रदूषण का अड्डा बना दिया था। अब अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के लिए शहरों से दूर अलग क्षेत्र चिन्हित किए जाएंगे। यह पर्यावरणीय न्याय की दिशा में आवश्यक कदम है।
इस निर्णय को समझने के लिए 1984 की भोपाल गैस त्रासदी को याद करना जरूरी है। एक रासायनिक कारखाने से निकली जहरीली गैस ने हजारों लोगों की जान ले ली और उसके दुष्प्रभाव आज भी दिखाई देते हैं। उस त्रासदी ने चेताया था कि खतरनाक उद्योगों को घनी आबादी के बीच स्थापित करना कितना विनाशकारी हो सकता है। इसके बावजूद आज भी कई शहरों में रिहायशी इलाकों के आसपास प्रदूषणकारी उद्योग चल रहे हैं। ऐसे में आबादी और उद्योगों के बीच सुरक्षित दूरी सुनिश्चित करना जरूरी है।
सरकार ने उद्योगों को लाल, नारंगी और हरी श्रेणियों में विभाजित किया है। लाल श्रेणी में चमड़ा प्रसंस्करण, ईंट भट्टे, स्टोन क्रशर, पटाखा निर्माण, रासायनिक उद्योग, पेट्रोलियम रिफाइनिंग, धातु प्रसंस्करण, कागज और न्यूजप्रिंट जैसे उद्योग शामिल हैं। इनसे निकलने वाले धुएं और अपशिष्ट में हानिकारक तत्व हो सकते हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित करते हैं। इसलिए इन्हें सामान्य उद्योगों के साथ रखना पर्यावरण के प्रति अन्याय है।
हालांकि, केवल उद्योगों को शहर से बाहर भेज देना समस्या का समाधान नहीं है। यदि वे बिना उपचार के अपशिष्ट नदियों में छोड़ेंगे, तो प्रदूषण शहरों से गांवों की ओर स्थानांतरित हो जाएगा। इसलिए कठोर निगरानी और प्रभावी दंड व्यवस्था जरूरी है। उद्योगों में निरंतर उत्सर्जन निगरानी प्रणाली लगाई जानी चाहिए, जिसके आंकड़े सीधे प्रदूषण नियंत्रण मंडल तक पहुंचें। बार-बार नियम तोड़ने वालों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को भी प्रदूषण संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि वे अपने पर्यावरण की निगरानी में भागीदारी निभा सकें।
इस पूरी व्यवस्था की सफलता मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल की कार्यक्षमता पर भी निर्भर करेगी। पर्याप्त तकनीकी संसाधनों, प्रशिक्षित कर्मचारियों और प्रभावी निरीक्षण के बिना कोई नीति सफल नहीं हो सकती। मंडल को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखकर उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। नियमों के पालन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
विश्व हरित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश को भी स्वच्छ तकनीक, अपशिष्ट उपचार संयंत्रों, सौर ऊर्जा और पर्यावरण अनुकूल औद्योगिक प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। अति प्रदूषणकारी उद्योगों को सामान्य क्षेत्रों से बाहर रखने का निर्णय सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन इसकी सफलता कठोर निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही सुशासन की कसौटी है। यदि हम आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और साफ पानी नहीं दे सकते, तो औद्योगिक विकास का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता।













