भोपाल, 19 अक्टूबर।
प्रदेश में उद्योग शुरू करने की प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से एक ही शिकायत सुनने को मिलती रही है कि उद्यमी को उद्योग कम और दफ्तरों के चक्कर अधिक लगाने पड़ते हैं। एक छोटी-सी इकाई लगाने के लिए भी कई खिड़कियों पर दस्तक देनी पड़ती है। हर टेबल पर अलग कागज, अलग शर्त और अलग इंतजार होता है। इसी पृष्ठभूमि में सरकार का नया प्रयोग चर्चा में आया है, जिसमें 15 प्रकार के कम जोखिम वाले उद्योगों को एक ही घोषणा पत्र से शुरू करने की सुविधा देने की बात कही गई है।
इस प्रयोग को केवल एक प्रशासनिक बदलाव कहना ठीक नहीं होगा। यह सरकार की सोच में बदलाव का संकेत है। अब तक व्यवस्था संदेह पर चलती थी। पहले रोको, फिर जांचो और उसके बाद अनुमति दो। अब सोच यह बन रही है कि पहले काम करने दो और भरोसा करो कि उद्यमी नियमों का पालन करेगा। यही भरोसा इस नई नीति की आत्मा है।
नई व्यवस्था का सबसे आकर्षक हिस्सा यह है कि एक ही ऑनलाइन आवेदन से नौ तरह की अनुमतियां एक साथ मिल जाएंगी। इसमें नगरीय निकाय, श्रम, ऊर्जा, प्रदूषण और अन्य विभागों की सहमतियां शामिल बताई जा रही हैं। पहले हर विभाग की अलग फाइल बनती थी और हर फाइल की अपनी यात्रा होती थी। अब एक ही फॉर्म सभी विभागों के सिस्टम में पहुंचेगा और 30 दिनों के भीतर निर्णय की अपेक्षा की गई है। यदि तय समय में किसी विभाग से आपत्ति नहीं आती, तो इसे स्वतः स्वीकृति माना जाएगा। यह व्यवस्था फाइलें लटकाने की पुरानी प्रवृत्ति पर रोक लगाने की उम्मीद जगाती है। हालांकि, यह देखना होगा कि सभी विभागों के सॉफ्टवेयर आपस में समन्वय कर पाते हैं या नहीं।
सरकार ने शुरुआत में उन्हीं उद्योगों को चुना है, जिनसे पर्यावरण और जनसुरक्षा को बड़ा खतरा नहीं माना जाता। इनमें कपास प्रसंस्करण, रबर उत्पाद, गुड़ निर्माण, जैविक खाद्य प्रसंस्करण, सॉफ्टवेयर असेंबली, जैव उर्वरक, पशु आहार, खिलौना निर्माण, पैकेजिंग, इलेक्ट्रॉनिक लैंप और शोध आधारित इकाइयां शामिल हैं। कम जोखिम वाले उद्योगों से शुरुआत करना रणनीतिक कदम है। यदि यहां प्रयोग सफल रहा, तो आगे अधिक जटिल उद्योगों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है।
दुनिया के कई विकसित देशों में उद्योग शुरू करने के लिए स्वघोषणा प्रणाली अपनाई जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि निगरानी समाप्त हो जाएगी, बल्कि पहले काम शुरू करने और बाद में सत्यापन करने की व्यवस्था होगी। इससे समय की बचत होगी और शुरुआती पूंजी पर दबाव कम पड़ेगा। छोटे उद्यमियों के लिए समय ही सबसे बड़ी पूंजी है। यदि उन्हें महीनों तक कागजी प्रक्रियाओं में उलझाए रखा जाए, तो उनकी कार्यशील पूंजी ब्याज चुकाने में ही खत्म हो जाती है।
इस व्यवस्था में एमपीआईडीसी को नोडल एजेंसी बनाया गया है। आवेदन और विभागों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी इसी पर होगी। लेकिन इसके पास इतनी शक्ति भी होनी चाहिए कि वह विभागों की देरी पर सवाल उठा सके। यदि वह केवल फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग तक पहुंचाने वाली संस्था बनकर रह गई, तो इसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति को लंबित मामलों की नियमित समीक्षा कर जवाबदेही तय करनी चाहिए।
यह व्यवस्था युवाओं और स्टार्टअप के लिए भी नए अवसर खोल सकती है। युवा अब केवल नौकरी खोजने के बजाय रोजगार देने वाला बनना चाहता है। एक इंजीनियरिंग छात्र छोटी पैकेजिंग इकाई या कृषि स्नातक जैव उर्वरक इकाई शुरू करना चाहे, तो उसे महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ने चाहिए। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों की संभावनाएं बढ़ेंगी और पलायन कम करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, केवल पोर्टल बना देने से कारोबार करना आसान नहीं हो जाता। इसके लिए अधिकारियों की सोच बदलना भी जरूरी है। स्वघोषणा के बाद यदि अनावश्यक निरीक्षण और दबाव जारी रहा, तो भरोसे पर आधारित यह नीति बेअसर हो जाएगी। निरीक्षण जोखिम के आधार पर होने चाहिए। साथ ही, गलत जानकारी देने और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अनुमति रद्द करने और जुर्माना लगाने जैसे प्रावधान भरोसे के दुरुपयोग को रोक सकते हैं।
इस प्रयोग की असली परीक्षा जमीन पर होगी। क्या जनवरी में प्रस्तावित निवेशक सम्मेलन से पहले पोर्टल पूरी तरह काम करने लगेगा? क्या जिलों के छोटे उद्यमियों तक इसकी जानकारी पहुंचेगी? सरकार को प्रत्येक जिले के जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र में हेल्प डेस्क बनाकर इस व्यवस्था का प्रचार करना चाहिए। एक फॉर्म से नौ अनुमतियां देने का विचार नया नहीं है, लेकिन इसे भरोसे से जोड़ना महत्वपूर्ण है। यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो मध्यप्रदेश उद्योगों के लिए देश के सबसे आसान राज्यों में शामिल हो सकता है। अन्यथा यह भी एक अच्छी फाइल बनकर अलमारी में बंद रह जाएगा।














