भोपाल, 19 अक्टूबर।
प्रदेश के आर्थिक प्रबंधन में इन दिनों दो समानांतर धाराएं दिखाई दे रही हैं। एक धारा कहती है कि खर्च नियंत्रित किया जाए और दूसरी कहती है कि निवेश आकर्षित करने के लिए वैश्विक मंचों पर उपस्थिति जरूरी है। दोनों बातें अपने स्थान पर कितनी उचित हैं और इनके बीच संतुलन कैसे बनेगा, यह विचार का विषय है।
पिछले जुलाई में वित्त विभाग की ओर से मितव्ययिता के संबंध में कुछ निर्देश जारी किए गए थे। इनमें सभी विभागों और निगमों से अपने खर्चों को युक्तिसंगत बनाने तथा कंसल्टेंसी जैसी सेवाओं पर पुनर्विचार करने को कहा गया था। इसका उद्देश्य प्रदेश में वित्तीय अनुशासन को मजबूत करना था। इसी बीच चर्चा है कि मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम जनवरी में दावोस में होने वाली विश्व आर्थिक मंच की बैठक में भाग लेने की तैयारी कर रहा है और इसके लिए कंसल्टेंसी सेवाओं की सहायता ली जा सकती है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या मितव्ययिता के निर्देश और वैश्विक आयोजनों की तैयारी साथ-साथ चल सकते हैं?
दावोस जैसे मंच पर दुनिया भर के नीतिनिर्माता, उद्योगपति और निवेशक एकत्रित होते हैं। ऐसे मंच पर प्रदेश की उपस्थिति से संभावित निवेशकों को मध्यप्रदेश की औद्योगिक क्षमताओं से परिचित कराने और प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करने का अवसर मिलता है। हालांकि, यह भी विचार करना होगा कि इस उपस्थिति को कम से कम खर्च में अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए।
वित्त विभाग ने कंसल्टेंसी सेवाओं पर संयम बरतने की बात कही है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि दावोस जैसी अंतरराष्ट्रीय बैठकों के लिए सलाहकारों की आवश्यकता क्यों है। अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल, निवेशकों से संपर्क और प्रचार सामग्री तैयार करने के लिए विशेष विशेषज्ञता जरूरी हो सकती है। लेकिन क्या निगम के उपलब्ध संसाधनों से यह काम संभव है? क्या कंसल्टेंसी की फीस और उससे मिलने वाले संभावित लाभ का तुलनात्मक आकलन किया गया है? इन प्रश्नों पर पहले से स्पष्टता रहे, तो भ्रांतियों की संभावना कम होगी।
पिछले वर्षों में प्रदेश कई बार दावोस में भाग ले चुका है। अब यह मूल्यांकन जरूरी है कि वहां मिले निवेश प्रस्तावों में से कितने वास्तविक निवेश में बदले। दावोस में खर्च की गई राशि और प्रदेश में आए वास्तविक निवेश के बीच संबंध का विश्लेषण सार्वजनिक होना चाहिए। इससे आगामी वर्षों की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। साथ ही, भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहरों में औद्योगिक क्षेत्रों तथा बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करके भी निवेश आकर्षित किया जा सकता है।
किसी आयोजन पर खर्च करना अपने आप में अनुचित नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि खर्च के अनुपात में लाभ कितना मिलता है। यात्रा दल का आकार सीमित करके, डिजिटल माध्यमों का अधिक उपयोग करके और वर्चुअल बैठकों के जरिए भी खर्च कम किया जा सकता है। दावोस यात्रा के बाद सरकार को विस्तृत रिपोर्ट जारी करनी चाहिए, जिसमें निवेशकों से हुई मुलाकातों, प्राप्त प्रस्तावों, उनके क्रियान्वयन और कुल खर्च का विवरण हो।
मितव्ययिता का अर्थ केवल खर्च रोकना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग करना भी है। यदि किसी खर्च से रोजगार और निवेश के अवसर पैदा होते हैं, तो उसका मूल्यांकन परिणामों के आधार पर होना चाहिए। हालांकि, इसके लिए पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य हैं।
प्रदेश को दावोस जाने से पहले अपनी औद्योगिक सुविधाओं, सिंगल विंडो व्यवस्था और स्थानीय उद्यमियों के लिए उपलब्ध अवसरों को भी मजबूत करना चाहिए। निवेश आकर्षित करने के साथ युवाओं और स्टार्टअप को वैश्विक मंच उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना चाहिए। मितव्ययिता और विकास परस्पर विरोधी लक्ष्य नहीं हैं। स्पष्ट मानकों, पारदर्शी खर्च और परिणामों के नियमित मूल्यांकन से दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।














