बयान में चुनावी नतीजों पर लगातार सवाल उठाने, अदालतों के फैसलों से असहमति होने पर न्यायपालिका की आलोचना करने और सेना को राजनीतिक बहस में शामिल करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई है।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि असहमति लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। हालांकि, इसे बहस, चर्चा और संवाद जैसे संवैधानिक तरीकों से व्यक्त किया जाना चाहिए। उन्होंने लोगों से लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास बनाए रखने की अपील की।
इस संयुक्त बयान पर चार महाद्वीपों के 27 देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने हस्ताक्षर किए हैं। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, रूस, जापान, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात सहित कई देशों के लोग शामिल हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं का संबंध एमआईटी, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, प्रिंसटन, हार्वर्ड, येल, स्टैनफोर्ड और कोलंबिया जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से रहा है। बयान में स्पष्ट किया गया है कि इसमें व्यक्त विचार हस्ताक्षरकर्ताओं के निजी विचार हैं, संबंधित विश्वविद्यालयों के नहीं।
बयान के अनुसार, आजादी के बाद सात दशकों में भारतीय लोकतंत्र मजबूत हुआ है। संवैधानिक संस्थाओं का विकास और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण इसकी प्रमुख विशेषताएं रही हैं।














