जिनेवा, 21 अक्टूबर।
जिनेवा से आई संयुक्त राष्ट्र की आपदा जोखिम न्यूनीकरण एजेंसी (यूएनडीआरआर) की रिपोर्ट ने दुनिया को राहत दी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच आपदाओं से होने वाली मौतों में 65 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। बेहतर पूर्व चेतावनी, समय पर निकासी और प्रभावी आपदा प्रबंधन से लोगों की जान बच रही है। यह विज्ञान और प्रशासन की साझा उपलब्धि है। लेकिन हर साल करीब 10 करोड़ लोग आपदाओं से प्रभावित होते हैं। यानी मौतें कम हुई हैं, पर बर्बादी अब भी जारी है।
मौतों में कमी का अर्थ यह नहीं कि आपदा प्रबंधन की चुनौती समाप्त हो गई है। किसान की फसल बह जाती है, मजदूर का घर ढह जाता है और छोटे दुकानदार का सामान बर्बाद हो जाता है। इसलिए अब जान बचाने के साथ आजीविका बचाने पर भी ध्यान देना होगा।
भारत के लिए चुनौती और बड़ी है। देश की 59 प्रतिशत जमीन भूकंप के खतरे वाले क्षेत्रों में है, जबकि 12 प्रतिशत जमीन बाढ़ के जोखिम में है। लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा पर चक्रवात और सुनामी का खतरा बना रहता है। हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने, भूस्खलन और हिमनद झीलों के फटने की घटनाएं भी चिंता बढ़ाती हैं। जोशीमठ का धंसना और हिमाचल प्रदेश में बाढ़ अनियंत्रित विकास के गंभीर परिणामों की याद दिलाते हैं।
ओडिशा ने आपदा प्रबंधन की अहम सीख दी है। 1999 के महाचक्रवात में करीब दस हजार लोगों की मौत के बाद राज्य ने निकासी योजनाओं और चक्रवात आश्रय स्थलों पर जोर दिया। 2019 में चक्रवात फानी के दौरान बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
चेतावनी स्थानीय भाषा में पहुंचनी चाहिए। भवन निर्माण नियमों का पालन हो, प्राकृतिक सुरक्षा कवच बचाए जाएं तथा फसल और मकान बीमा के साथ प्रभावितों को रोजगार सहायता मिले।
मौतों में 65 प्रतिशत की कमी बड़ी उपलब्धि है, लेकिन जंग अभी बाकी है। भारत को ओडिशा के अनुभवों से सीखकर आपदा प्रबंधन को व्यापक बनाना होगा। तभी हम मौतों के साथ बर्बादी और दर्द भी कम कर सकेंगे।













