भोपाल, 22 अक्टूबर।
मध्यप्रदेश के आठ से अधिक जिलों में इस बार सामान्य से कम बारिश हुई है। अलीराजपुर, धार, झाबुआ, रतलाम, बैतूल, इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम, पांढुर्णा, छिंदवाड़ा, हरदा और शाजापुर जैसे जिले इस सूची में हैं। कम बारिश केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि खेतों से लेकर घरों के नलों तक असर डालने वाले संकट की शुरुआत है। इसका अर्थ है कि जमीन में कम पानी पहुंचा, बांधों में जलभराव कम हुआ और किसानों की योजनाएं प्रभावित हुईं।
रबी की बुवाई के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी है। नमी की कमी से किसानों को बुवाई से पहले ही सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ती है। ऐसे में किसानों की सिंचाई के लिए पानी की मांग स्वाभाविक है, लेकिन प्रशासन को इसे सामान्य प्रक्रिया के बजाय असामान्य परिस्थिति मानकर देखना चाहिए।
कम बारिश से बांधों के जल प्रबंधन का संतुलन भी बिगड़ता है। सिंचाई के लिए अधिक पानी छोड़ने पर मार्च-अप्रैल में पेयजल संकट गहरा सकता है, जबकि पानी रोकने से गेहूं, चना और सरसों की फसलें प्रभावित होंगी। इसके बावजूद कई जिलों में बांधों से पानी छोड़ने संबंधी कार्ययोजना स्पष्ट नहीं होना चिंता का विषय है।
नहरों से पर्याप्त पानी नहीं मिलने पर किसान ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भर होते हैं, जिससे भूजल स्तर गिरने का खतरा बढ़ता है। अतिरिक्त सिंचाई, डीजल और बिजली का खर्च किसानों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ाता है। समय पर पानी नहीं मिलने से बुवाई पिछड़ सकती है और पैदावार प्रभावित हो सकती है।
इस संकट से निपटने के लिए प्रत्येक जिले में बांधवार जल बजट तैयार कर सार्वजनिक किया जाना चाहिए। पेयजल और सिंचाई के बीच स्पष्ट प्राथमिकता तय करने के साथ ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना जरूरी है। कम पानी में अधिक उत्पादन देने वाली फसलों के प्रति किसानों को जागरूक करना भी आवश्यक है।
कम बारिश प्राकृतिक परिस्थिति है, लेकिन उससे निपटने की तैयारी प्रशासन की जिम्मेदारी है। समय रहते ठोस योजना नहीं बनी तो खेतों के साथ जलापूर्ति और प्रशासनिक विश्वसनीयता पर भी संकट गहरा सकता है।













