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संपादकीय
22 Oct, 2026

देश में पहली बार सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड से फंडिंग: क्या है सोशल स्टॉक एक्सचेंज

मध्य प्रदेश सरकार ने सोशल स्टॉक एक्सचेंज के जरिए चार करोड़ रुपये जुटाकर ओबीसी वर्ग के विद्यार्थियों को जापान और जर्मनी में रोजगार दिलाने के लिए देश के पहले सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड मॉडल की शुरुआत की है।

भोपाल, 22 अक्टूबर।

देश में पहली बार मध्यप्रदेश सरकार ने एक नया प्रयोग किया है, जिसे अपनी तरह की पहली पहल बताया जा रहा है। सरकारी भागीदारी के साथ सामाजिक कल्याण कार्यक्रम के लिए सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड के माध्यम से राशि जुटाने की यह पहल है। सरकार ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के सोशल स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से चार करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। इस राशि का उपयोग अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को जापान और जर्मनी में रोजगार दिलाने के लिए प्रशिक्षण और प्लेसमेंट कार्यक्रम पर किया जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य केवल धन जुटाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें सरकार के साथ निजी निवेशक भी सामाजिक बदलाव में भागीदार बनें और उसके परिणाम धरातल पर दिखाई दें।

मध्यप्रदेश सरकार ने तय किया है कि प्रदेश के पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को विदेश में रोजगार के लिए तैयार किया जाएगा। इसके लिए जापानी तथा जर्मन भाषा और व्यक्तित्व विकास का प्रशिक्षण दिया जाएगा। योजना की खास बात यह है कि संबंधित एजेंसी को भुगतान उम्मीदवारों के विदेश में प्लेसमेंट की लिखित पुष्टि मिलने के बाद ही किया जाएगा। यानी सरकारी भुगतान को केवल प्रशिक्षण देने के बजाय रोजगार से जोड़ा गया है। यह अब तक की पारंपरिक योजनाओं से अलग दृष्टिकोण है। वित्त विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था सुनिश्चित करेगी कि प्रशिक्षण केवल खानापूर्ति बनकर न रह जाए, बल्कि उसका परिणाम रोजगार के रूप में सामने आए और युवा विदेश में नौकरी पाने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

योजना के तहत मध्यप्रदेश में स्क्रीनिंग प्रक्रिया के माध्यम से उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा। चयनित विद्यार्थियों को उनकी जरूरत और निर्धारित रोजगार लक्ष्यों के अनुरूप कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके साथ जापानी तथा जर्मन भाषा का प्रशिक्षण भी कार्यक्रम का हिस्सा होगा। एजेंसी की जिम्मेदारी केवल प्रशिक्षण देने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसे उम्मीदवारों को संबंधित देशों में रोजगार के लिए तैयार करने, प्लेसमेंट से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी कराने और विदेश में नौकरी दिलाने की प्रक्रिया में सहायता करनी होगी। यह पूरी प्रक्रिया परिणाम आधारित होगी, जिसमें एजेंसी को तभी भुगतान मिलेगा, जब वह निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करेगी।

सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड एक ऐसा वित्तीय साधन है, जिसके माध्यम से सामाजिक परियोजनाओं के लिए निवेश जुटाया जाता है। इसमें निवेशकों का प्रतिफल परियोजना के निर्धारित सामाजिक परिणामों से जुड़ा हो सकता है। मध्यप्रदेश की इस पहल में एनएसई के सोशल स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से चार करोड़ रुपये जुटाए जाने का लक्ष्य है। इस राशि का उपयोग ओबीसी विद्यार्थियों के प्रशिक्षण और विदेश में रोजगार की तैयारी पर किया जाएगा। सरकारी भागीदारी के साथ सामाजिक कल्याण कार्यक्रम के लिए इस तरह राशि जुटाने की पहल का उद्देश्य सरकारी खजाने पर एकमुश्त बोझ डाले बिना योजनाओं को गति देना है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में 18 नवंबर 2025 को हुई कैबिनेट बैठक में मध्यप्रदेश में सोशल इम्पैक्ट बॉन्ड के क्रियान्वयन से संबंधित संशोधनों को मंजूरी दी गई थी। प्रदेश में इस व्यवस्था के क्रियान्वयन की निगरानी की जिम्मेदारी वित्त विभाग को सौंपी गई है। पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कार्यक्रम के माध्यम से पात्र विद्यार्थियों को विदेशी रोजगार के लिए जरूरी तकनीकी कौशल, भाषा प्रशिक्षण और व्यक्तित्व विकास का अवसर मिलेगा। जापान और जर्मनी में नौकरी के लिए संबंधित भाषा का ज्ञान और निर्धारित कौशल महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में प्रशिक्षण के साथ प्लेसमेंट पर जोर देने से विद्यार्थियों को रोजगार के लिए तैयार करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि एजेंसी का भुगतान विद्यार्थियों को विदेश में नौकरी मिलने की पुष्टि से जुड़ा है। इससे उसकी जवाबदेही तय करने और सरकारी धन के प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। अक्सर प्रशिक्षण योजनाओं में प्रशिक्षण तो दे दिया जाता है, लेकिन उसके बाद रोजगार नहीं मिलता और युवा बेरोजगार रह जाते हैं। इस मॉडल में प्रशिक्षण देने वाली एजेंसी का हित भी विद्यार्थी के रोजगार से जुड़ा है। इसलिए उससे अधिक गंभीरता और जवाबदेही के साथ काम करने की अपेक्षा की जा सकती है। यह मॉडल निजी क्षेत्र की कार्यकुशलता और सरकारी संसाधनों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने का प्रयास है।

मध्यप्रदेश जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में हैं, विदेश में रोजगार के अवसर तलाशना एक नई सोच है। जापान और जर्मनी जैसे देशों में कुशल श्रमिकों की मांग भारतीय युवाओं के लिए संभावनाएं खोल सकती है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो अन्य वर्गों के लिए भी इस तरह की योजनाओं का विस्तार किया जा सकता है। यह मॉडल देश के दूसरे राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है।

हालांकि, इस योजना की सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि जापान और जर्मनी में नौकरी के लिए केवल भाषा का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। वहां की कार्यसंस्कृति, कानूनी प्रक्रियाओं और सामाजिक परिवेश के अनुरूप ढलना भी जरूरी है। वीजा प्रक्रिया, नियोक्ताओं से संपर्क और विद्यार्थियों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी गंभीरता से काम करना होगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विदेश में नौकरी के नाम पर किसी तरह का शोषण न हो और विद्यार्थियों को सम्मानजनक वेतन तथा उचित कार्य परिस्थितियां मिलें।

कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश सरकार का यह प्रयोग केवल चार करोड़ रुपये जुटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक कल्याण के लिए बाजार से संसाधन जुटाने और उनका उपयोग परिणाम आधारित तरीके से करने की नई सोच का प्रतीक है। यदि जुटाई गई राशि का प्रभावी उपयोग होता है और निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार विद्यार्थियों को जापान तथा जर्मनी में रोजगार मिलता है, तो यह सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल बन सकता है। सोशल स्टॉक एक्सचेंज का उपयोग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आने वाले समय में इसके परिणाम ही तय करेंगे कि यह मॉडल कितना सफल रहता है।

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