पेरिस, 22 अक्टूबर।
यूरोप, जिसे लंबे समय तक शांति, स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है, आज उसी की सड़कों पर आग दिखाई दे रही है। फ्रांस के कई शहरों में हिंसा के बीच उपद्रवियों ने जमकर उत्पात मचाया है। पेरिस में रोलेक्स, लुई विटॉन और डिजायर जैसी बड़ी कंपनियों के शोरूमों में तोड़फोड़ और लूटपाट की गई है। इटली, पुर्तगाल, स्पेन, बेल्जियम और अल्बानिया भी विरोध प्रदर्शनों से अछूते नहीं हैं। फ्रांस में पेरिस समेत कई शहरों में जारी हिंसा के दौरान सैकड़ों प्रदर्शन हुए हैं। पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जबकि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है।
यह दृश्य केवल एक देश का नहीं है, बल्कि यूरोप के कई देशों में युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूट रहा है। सवाल उठता है कि जिस यूरोप को युवा पीढ़ी के लिए बेहतर भविष्य देने वाला माना जाता था, वहां युवा ही हिंसा पर क्यों उतर आए हैं?
हर देश में विरोध के मुद्दे अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन उनके पीछे का दर्द एक जैसा है। फ्रांस में शिक्षा सुधार, सार्वजनिक सेवाओं और असमानता को लेकर विरोध हुआ है। रोमानिया में महिलाओं ने शिक्षा और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ प्रदर्शन किए। इटली में महंगाई, स्थिर वेतन और जीवनयापन की बढ़ती लागत के खिलाफ गुस्सा है। स्पेन में घरों के किराये में कमी की मांग हो रही है। बेल्जियम में शिक्षा की बढ़ती लागत और सुधारों को लेकर असंतोष है। अल्बानिया में सरकार विरोधी प्रदर्शन प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग तक पहुंच गए हैं। पुर्तगाल में आवास की बढ़ती कीमतों और जीवनयापन की कठिनाइयों को लेकर लोग सड़कों पर हैं। इन सभी मांगों में एक समानता है, वह है भविष्य को लेकर असुरक्षा और वर्तमान को लेकर असंतोष।
यूरोप में पिछले कुछ वर्षों में महंगाई बढ़ी है। कोरोना महामारी के बाद जीवनयापन की लागत में वृद्धि हुई है। घर का किराया, बिजली का बिल, खाने-पीने का खर्च और शिक्षा की फीस बढ़ी है, लेकिन वेतन उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। युवाओं के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। वे पढ़ाई पूरी करके नौकरी तलाशते हैं, लेकिन अच्छी नौकरी नहीं मिलती। नौकरी मिलने पर भी वेतन इतना कम होता है कि बड़े शहरों में जीवनयापन मुश्किल हो जाता है। जब दिन-रात मेहनत करने के बाद भी युवा अपने लिए छोटा-सा घर नहीं खरीद पाता, तो व्यवस्था के प्रति उसके मन में गुस्सा पैदा होता है।
यूरोप में शिक्षा को सामाजिक समानता का बड़ा माध्यम माना जाता रहा है, लेकिन अब उसी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों का कहना है कि शिक्षा महंगी होती जा रही है, विश्वविद्यालयों की फीस बढ़ रही है और डिग्री हासिल करने के बाद भी रोजगार की गारंटी नहीं है। जब शिक्षा, जो बेहतर भविष्य की उम्मीद थी, बोझ बन जाए तो युवा खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।
पुर्तगाल, स्पेन और फ्रांस जैसे देशों में आवास की कीमतें भी बड़ी समस्या बन गई हैं। बड़े शहरों में किराया इतना अधिक है कि युवा अपनी आय का बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च कर देते हैं। कई युवा तीस वर्ष की उम्र तक माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। इससे उनकी स्वतंत्र जीवन जीने और परिवार बसाने की योजनाएं प्रभावित होती हैं। जब रहने के लिए घर ही उपलब्ध न हो, तो व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है।
यूरोपीय युवाओं में राजनीतिक दलों और सरकारों के प्रति अविश्वास भी बढ़ा है। उन्हें लगता है कि पारंपरिक राजनीतिक दल उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते। चुनाव के समय वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद नीतियों में अपेक्षित बदलाव नहीं होता। जब लोकतंत्र में संवाद की जगह टकराव लेने लगता है, तो असंतोष बढ़ता है। सोशल मीडिया ने इस आक्रोश को तेजी से फैलाने का काम किया है। एक शहर में हुई घटना दूसरे शहरों तक तुरंत पहुंच जाती है। गलत जानकारी और अफवाहों के कारण कई बार शांतिपूर्ण विरोध भी हिंसक रूप ले लेता है।
युवाओं की मांगें महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और आवास जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ी हैं, लेकिन हिंसा और लूटपाट समाधान नहीं हैं। पेरिस में महंगे शोरूमों में लूटपाट से गरीबों का भला नहीं होगा, बल्कि इससे आंदोलन की विश्वसनीयता कमजोर होगी। हिंसा से पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच दूरी बढ़ती है तथा मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
यूरोप में बढ़ता युवा असंतोष पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। सरकारों को युवाओं से संवाद करना होगा, उनकी समस्याओं को सुनना होगा और नीतियों में जरूरी बदलाव करने होंगे। आवास नीति में सुधार, सस्ती और रोजगारपरक शिक्षा तथा सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है। राजनीतिक दलों को भी युवाओं को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि नीति निर्माण में भागीदार समझना होगा।
यूरोप की घटनाएं भारत के लिए भी सबक हैं। यहां भी युवा आबादी बहुत बड़ी है। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सस्ता आवास और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिलेगा, तो असंतोष बढ़ सकता है। इसलिए समय रहते युवाओं को वास्तविक अवसर उपलब्ध कराने होंगे। यूरोप की सड़कों पर दिखाई दे रही आग केवल दुकानों और इमारतों की आग नहीं, बल्कि युवाओं के भीतर सुलगते असंतोष का प्रतीक है। इस आग को संवाद, समाधान और संवेदना से ही बुझाया जा सकता है।














