रुड़की, 22 अक्टूबर।
अति भारी तत्वों के रासायनिक गुणों को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। जर्मनी के डार्मस्टाट स्थित जीएसआई/फेयर संस्थान के नेतृत्व में हुए अंतरराष्ट्रीय शोध में पहली बार किसी अति भारी तत्व के यौगिक में रासायनिक बंध की मजबूती मापी गई है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन में आईआईटी रुड़की ने भी योगदान दिया है। शोध प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है।
आईआईटी रुड़की की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, वैज्ञानिकों ने परमाणु संख्या 106 वाले सीबोर्गियम के हेक्साकार्बोनिल यौगिक एसजी(सीओ)6 का अध्ययन किया। जांच में सामने आया कि सीबोर्गियम और कार्बन मोनोऑक्साइड के बीच रासायनिक बंध अपेक्षा से कमजोर है। इसके पीछे सापेक्षता का प्रभाव प्रमुख कारण माना गया है।
अति भारी तत्वों में 104 से 118 तक परमाणु संख्या वाले तत्व शामिल हैं। इन्हें कण त्वरकों की सहायता से कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है। इनका निर्माण बेहद कम मात्रा में होता है और इनका जीवनकाल आधे सेकंड से भी कम रहता है। इसी कारण इनके रासायनिक गुणों का अध्ययन करना वैज्ञानिकों के लिए चुनौतीपूर्ण है।
जीएसआई/फेयर के शोधकर्ताओं के अनुसार, क्रोमियम से मोलिब्डेनम और फिर टंगस्टन तक पहुंचने पर रासायनिक बंध की मजबूती बढ़ती है। वैज्ञानिकों को सीबोर्गियम में इस क्रम के विपरीत परिणाम मिले। अधिक परमाणु संख्या के कारण इलेक्ट्रॉनों की संरचना में बदलाव आता है, जिससे बंध कमजोर हो जाता है। हाल की क्वांटम रासायनिक गणनाओं ने भी इस निष्कर्ष का समर्थन किया है।
इस शोध में आईआईटी रुड़की की प्रो. मौमिता मैती की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बताया कि अति भारी तत्वों पर अनुसंधान के लिए अत्याधुनिक तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता होती है। इस परियोजना में विभिन्न संस्थानों की विशेषज्ञता का लाभ मिला।
प्रयोग के दौरान सीबोर्गियम-259 के कुल 75 परमाणु दर्ज किए गए। इनमें से केवल तीन परमाणु हेक्साकार्बोनिल यौगिक के रूप में मिले। इसके मुकाबले टंगस्टन के 17 प्रतिशत परमाणुओं ने यह यौगिक बनाया। इन परिणामों के आधार पर सीबोर्गियम के रासायनिक बंध की मजबूती 4 किलो जूल प्रति मोल कम आंकी गई।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग से यह उपलब्धि संभव हो सकी है। अब शोध दल सीबोर्गियम से भी अधिक भारी तत्वों पर प्रयोग करने की तैयारी में जुटा है।














