काठमांडू, 08 अक्टूबर।
नेपाल और अमेरिका के बीच मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (एमसीसी) कॉम्पैक्ट के तहत चल रही परियोजनाओं की समयसीमा अधिकतम एक वर्ष बढ़ाने पर सहमति लगभग बन गई है। नेपाल के वित्त मंत्रालय के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद विदेशी सहायता की समीक्षा के कारण एमसीसी से वित्तपोषित परियोजनाओं का काम कई महीनों तक प्रभावित रहा। इसके अलावा त्रिशूली नदी में आई विनाशकारी बाढ़ से भी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी हुई। एमसीसी समझौते के तहत परियोजनाएं इसके लागू होने की तारीख से पांच वर्ष में पूरी की जानी हैं। नेपाल का कॉम्पैक्ट 30 अगस्त 2023 को प्रभावी हुआ था, इसलिए मौजूदा समयसीमा अगस्त 2028 तक है। प्रस्तावित विस्तार ‘नो-कॉस्ट एक्सटेंशन’ होगा, यानी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा, लेकिन कुल परियोजना लागत में बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले की हालिया अमेरिका यात्रा के दौरान भी इस विषय पर चर्चा हुई थी। उन्होंने एमसीसी के कार्यवाहक उपाध्यक्ष जेसन स्मॉल से मुलाकात की थी और दोनों पक्ष जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त समय देकर परियोजनाओं को पूरा करने के सिद्धांत पर सहमत हुए हैं।
मिलेनियम चैलेंज अकाउंट नेपाल पहले ही वित्त मंत्रालय को समयसीमा बढ़ाने का प्रस्ताव दे चुका है। अब इसे मंत्रिपरिषद के समक्ष रखा जाना है, जिसके बाद नेपाल सरकार औपचारिक निर्णय एमसीसी को भेजेगी। वित्त मंत्रालय के अनुसार, एमसीसी बोर्ड दिसंबर में होने वाली बैठक में नेपाल के अनुरोध पर विचार कर सकता है। अमेरिका के वित्त वर्ष 2026 के विनियोग कानून में भी नेपाल के एमसीसी कॉम्पैक्ट की अवधि एक वर्ष तक बढ़ाने का प्रावधान है, हालांकि यह धन की उपलब्धता और संबंधित अमेरिकी कांग्रेस समितियों को सूचना देने जैसी शर्तों पर निर्भर करेगा। नेपाल और अमेरिका ने 14 सितंबर 2017 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य नेपाल में बिजली प्रसारण ढांचे और सड़क बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है। मूल समझौते के तहत अमेरिका ने 500 मिलियन डॉलर का अनुदान देने की प्रतिबद्धता जताई थी, जिसे बाद में 50 मिलियन डॉलर बढ़ाकर 550 मिलियन डॉलर किया गया। नेपाल ने शुरुआत में 130 मिलियन डॉलर का योगदान तय किया था, लेकिन परियोजना लागत बढ़ने के बाद मई 2023 में 67 मिलियन डॉलर अतिरिक्त देने का फैसला किया। इस तरह कार्यक्रम की कुल लागत 747 मिलियन डॉलर है, जिसमें अमेरिका का योगदान 550 मिलियन डॉलर और नेपाल का 197 मिलियन डॉलर है।













