प्रयागराज, 23 अक्टूबर।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यौन उत्पीड़न के मामले में पीड़ित नाबालिग को केवल मेडिकल रिपोर्ट में शारीरिक चोट के निशान नहीं मिलने के आधार पर मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने अधिकारियों को उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष योजना के तहत नाबालिग को तीन लाख रुपये देने का निर्देश दिया। अदालत ने यह राशि आदेश की प्रमाणित प्रति जमा होने के दस दिनों के भीतर देने को कहा है।
हाई कोर्ट ने जिला संचालन समिति के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें मुआवजा रोक दिया गया था। अदालत ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 के तहत प्रवेशात्मक यौन उत्पीड़न के मामले में शारीरिक चोट होना अनिवार्य शर्त नहीं है। शरीर पर चोट के निशान न होना अपने आप में यौन उत्पीड़न के आरोप को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि जब प्राथमिकी और आरोपपत्र में अधिनियम की धारा 4 के तहत अपराध का उल्लेख हो, तो केवल चोट दर्ज नहीं होने वाली मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर मुआवजा रोकना उचित नहीं है। अदालत के अनुसार, यह योजना पीड़ितों के मानसिक आघात और पीड़ा को कम करने के उद्देश्य से बनाई गई है, इसलिए इसकी व्याख्या उदारता के साथ की जानी चाहिए।














