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हरियाणा
23 Oct, 2026

हरियाणा में निजीकरण के विरोध में बिजली कर्मचारियों की हड़ताल, गहराया भारी संकट

हरियाणा में बिजली आपूर्ति निजी हाथों में सौंपने के फैसले के विरोध में कर्मचारियों की हड़ताल से राज्य भर में बिजली और पानी का गंभीर संकट पैदा हो गया है।

चंडीगढ़, 23 अक्टूबर।

हरियाणा बिजली नियामक आयोग द्वारा गुरुग्राम तथा नूंह क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति का जिम्मा निजी कंपनी को सौंपने के निर्णय के खिलाफ बिजली कर्मचारियों की हड़ताल से पूरे राज्य में भारी बिजली संकट उत्पन्न हो गया है।अनेक क्षेत्रों में बिजली गुल होने के बाद भी व्यवस्था बहाल नहीं की जा पा रही है। इस गहराते संकट का सीधा असर पीने के पानी की सप्लाई पर भी दिखने लगा है।

पिछले 24 घंटों के दौरान राज्य भर में 33 केवी के 118 और 11 केवी के 510 से अधिक फीडर ठप पड़े रहे। भिवानी जिले में सर्वाधिक 280 फीडरों में कामकाज बाधित रहा।करनाल, भिवानी, यमुनानगर और अंबाला के कई इलाकों में 28 घंटे से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बिजली आपूर्ति बहाल नहीं की जा सकी।देर रात गुरुग्राम, फरीदाबाद तथा सिरसा में परेशान नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर जाम लगाया और विरोध प्रदर्शन किया। शुक्रवार को आंदोलन के दूसरे दिन भी स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखा।

हिसार के वीआईपी इलाकों में बीते 24 घंटे से ब्लैकआउट की स्थिति है। वहीं झज्जर जिले में सीएनजी पंपों का संचालन भी ठप पड़ गया है।गंभीर होते हालातों के बीच शुक्रवार सुबह हरियाणा के ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर संदेश जारी कर हड़ताली कर्मियों से काम पर लौटने का आग्रह किया।विज ने कर्मचारियों से अपील करते हुए कहा कि वे तुरंत अपनी ड्यूटी संभालें, सरकार हर विकल्प पर चर्चा के लिए तैयार है। इसमें विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 108 के तहत कदम उठाना भी शामिल है।

ऊर्जा मंत्री के इस वक्तव्य के बाद प्रशासनिक व राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छिड़ गई है।उल्लेखनीय है कि विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 108 राज्य सरकार को नीतिगत विषयों पर राज्य बिजली नियामक आयोग को लिखित आदेश देने का अधिकार प्रदान करती है।अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते समय नियामक आयोग लोकहित से जुड़े नीतिगत मुद्दों पर राज्य सरकार के लिखित निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होता है।

यदि यह प्रश्न उठता है कि निर्देश जनहित से जुड़ा है या नहीं, तो उस पर राज्य सरकार का फैसला ही अंतिम माना जाता है।यद्यपि राज्य सरकार आयोग को निर्देश जारी कर सकती है, परंतु सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्णयों के अनुसार नियामक आयोग सरकार के प्रत्येक आदेश से पूर्णतः बाध्य नहीं होता और अपने न्यायिक विवेक तथा कानून के दायरे में ही कार्य करता है।

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