नई दिल्ली, 24 अक्टूबर।
नई दिल्ली में संसद के गलियारों में इन दिनों दो शब्द सबसे अधिक गूंज रहे हैं, महिला आरक्षण और परिसीमन। सरकार चाहती है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कर दी जाएं और इसी नई व्यवस्था में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत जगह सुनिश्चित की जाए। यह योजना सुनने में सरल लगती है, लेकिन इसके पीछे संविधान, राजनीति और क्षेत्रीय संतुलन का बड़ा गणित छिपा हुआ है। सरकार ने इसके लिए तीन विधेयक पेश किए थे, जिनमें लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाने, 2029 से पहले आरक्षण लागू करने और नए सिरे से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने के प्रस्ताव थे। हालांकि, आम सहमति नहीं बनने के कारण ये विधेयक वापस लेने पड़े। अब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू फिर विपक्ष से सहयोग मांग रहे हैं और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर समर्थन की अपील कर रहे हैं। सवाल है कि क्या यह सहयोग इतनी आसानी से मिल पाएगा?
वर्ष 2023 में महिला आरक्षण कानून संसद से पारित हो गया था। देशभर में महिलाओं ने खुशियां मनाई थीं, लेकिन कानून में एक शर्त के कारण इसके लागू होने का इंतजार बढ़ गया। प्रावधान किया गया कि आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा। जनगणना 2021 में होनी थी, लेकिन अब तक नहीं हो सकी और परिसीमन की प्रक्रिया भी लंबित है। इस कारण कानून कागजों पर है, लेकिन जमीन पर लागू नहीं हुआ है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने कानून बनाकर श्रेय तो ले लिया, लेकिन उसे लागू करने में गंभीरता नहीं दिखाई।
सरकार का तर्क है कि परिसीमन के बिना आरक्षित सीटें तय करना संभव नहीं है। परिसीमन का अर्थ चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करना है, ताकि प्रतिनिधित्व में संतुलन बना रहे। भारत में आखिरी बार परिसीमन 2008 में हुआ था, जो 2001 की जनगणना पर आधारित था। उस समय तय किया गया था कि 2026 तक लोकसभा की सीटें नहीं बढ़ाई जाएंगी, ताकि परिवार नियोजन में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को नुकसान न हो।
अब 2026 नजदीक है। यदि जनसंख्या को आधार बनाकर सीटों का पुनर्वितरण किया गया, तो उत्तर भारत के राज्यों में सीटें तेजी से बढ़ सकती हैं, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम बढ़ेगी। इसी आशंका से डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, वाम दल और अन्य विपक्षी दल चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि केवल आबादी को पैमाना बनाने से संसद में उनका राजनीतिक प्रभाव घट सकता है।
इस मुद्दे पर विपक्ष के विचार भी अलग-अलग हैं। कांग्रेस का कहना है कि मौजूदा 543 सीटों में ही एक तिहाई महिलाओं को आरक्षण दिया जा सकता है। समाजवादी पार्टी जातिगत जनगणना की मांग कर रही है, जबकि डीएमके दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय की आशंका जता रही है। तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक लाभ से जोड़कर देखती है। ऐसे में सरकार के सामने सभी दलों को एकमत करना बड़ी चुनौती है।
महिला आरक्षण केवल संख्या बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलाव का अवसर है। यदि 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होता है, तो महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा रोजगार जैसे मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर मिलेगा। हालांकि, आरक्षण के भीतर ओबीसी और अन्य वंचित वर्गों की महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर भी व्यापक चर्चा जरूरी है, क्योंकि सभी महिलाओं की सामाजिक स्थिति एक जैसी नहीं है।
सरकार और विपक्ष को टकराव के बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। जनगणना जल्द पूरी हो, परिसीमन में क्षेत्रीय संतुलन का ध्यान रखा जाए और महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा स्पष्ट हो। आठ सौ पचास सीटों वाली लोकसभा केवल संसद के विस्तार का विचार नहीं, बल्कि व्यापक प्रतिनिधित्व की परिकल्पना है। यदि इसमें आधी आबादी को पर्याप्त स्थान नहीं मिला, तो यह परिकल्पना अधूरी रहेगी। सुधार टालने से नहीं, समय पर लागू करने से भरोसा बनता है।














