नई दिल्ली, 24 अक्टूबर।
तीन दिनों तक मुंबई और दिल्ली में चली गहन मंत्रणाओं के बाद अब यह माना जा रहा है कि भारत और अमेरिका अपने बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के करीब हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का यह कहना कि दोनों देश समझौते के बिल्कुल करीब हैं, केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक बड़ा संकेत है।
मुंबई में हुए फ्रीडम 250 कार्यक्रम में भारत में अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर ने जो लक्ष्य रखा, वह इस बातचीत को और गंभीर बनाता है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों का आपसी व्यापार 240 अरब डॉलर को पार कर चुका है और राष्ट्रपति का निर्देश है कि इसे अगले तीन वर्षों में 500 अरब डॉलर तक ले जाना है। यह लक्ष्य बताता है कि अमेरिका भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालीन आर्थिक साझेदार के रूप में देख रहा है।
यह समझौता केवल व्यापार का नहीं, भरोसे का भी है। अक्सर व्यापार समझौतों को आयात-निर्यात के आंकड़ों से तौला जाता है, लेकिन भारत-अमेरिका का प्रस्तावित समझौता उससे कहीं बड़ा है। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता जैसे विषय भी जुड़े हुए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक में रुबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत की सामरिक स्वायत्तता का सम्मान करता है और उसकी विदेश नीति पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाना चाहता। यही कारण है कि रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भी अमेरिकी रुख में नरमी देखी गई।
रुबियो ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग क्षमताओं वाले देशों में शामिल है। वह रूस से कच्चा तेल लेकर उसे शोधित कर दुनिया को उपलब्ध कराता है। इससे वैश्विक तेल बाजार में संतुलन बना रहता है। यह बयान उन आलोचनाओं को विराम देता है, जो भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर की जाती रही हैं।
पिछले दो वर्षों से यह समझौता कई कारणों से अटका हुआ था। अमेरिका चाहता था कि भारत अपने कृषि उत्पादों, डेयरी और मेडिकल उपकरणों के बाजार को खोले तथा ई-कॉमर्स और डेटा स्थानीयकरण के नियमों में ढील दे। वहीं, भारत चाहता था कि अमेरिका भारतीय स्टील, एल्युमिनियम और टेक्सटाइल पर लगे अतिरिक्त शुल्क हटाए तथा भारतीय कुशल पेशेवरों के लिए वीजा नियम आसान बनाए।
अब दोनों पक्षों के बीच बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है। कुछ अंतिम तकनीकी मुद्दे सुलझने के बाद समझौते को आगे बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, इसकी शर्तों और अंतिम स्वरूप को लेकर आधिकारिक पुष्टि जरूरी होगी।
इस दौरे के दौरान एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई। कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि अमेरिका ने भारत से यूक्रेन को मिसाइल या गोला-बारूद नहीं देने को कहा है। रुबियो ने इस खबर को खारिज करते हुए कहा कि भारत एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र है तथा उसे किसे क्या देना है, यह उसका अपना निर्णय है। यह स्पष्टीकरण भारत की संतुलित विदेश नीति को मजबूती देता है। भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेने वाला देश है।
240 अरब डॉलर से 500 अरब डॉलर तक पहुंचना कोई छोटा लक्ष्य नहीं है, लेकिन इसे असंभव भी नहीं कहा जा सकता। भारत-अमेरिका व्यापार में सेवा क्षेत्र की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाती हैं। यदि वस्तु व्यापार में भी शुल्क कम होते हैं, तो भारतीय दवा, कपड़ा और इंजीनियरिंग उत्पाद अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। दूसरी ओर, अमेरिका भारत को रक्षा उपकरण, नागरिक विमान और ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश उपलब्ध करा सकता है। ग्रीन हाइड्रोजन और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में संयुक्त उत्पादन की संभावनाएं भी हैं।
हालांकि, हर व्यापार समझौते का संवेदनशील पहलू घरेलू उत्पादकों पर उसका असर होता है। भारत में करोड़ों छोटे किसान और लघु उद्योग हैं। यदि अमेरिकी सोयाबीन, मक्का या डेयरी उत्पाद बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के भारतीय बाजार में आए, तो स्थानीय उत्पादकों को नुकसान हो सकता है। इसलिए सरकार को कोटा, न्यूनतम आयात मूल्य और सुरक्षा शुल्क जैसे उपायों पर विचार करना चाहिए। डेटा सुरक्षा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। भारत अपने नागरिकों के डेटा की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है, जबकि अमेरिकी तकनीकी कंपनियां इस क्षेत्र में अधिक लचीले नियम चाहती हैं। दोनों पक्षों को संतुलित समाधान निकालना होगा।
इस समझौते को केवल द्विपक्षीय नजरिये से देखना भी उचित नहीं होगा। इसका एक बड़ा संदर्भ चीन है। अमेरिका और यूरोप की कई कंपनियां चीन प्लस वन नीति के तहत अपना उत्पादन चीन से हटाकर भारत, वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों में ले जाना चाहती हैं। यदि भारत अमेरिका के साथ स्थिर और भरोसेमंद व्यापार ढांचा बना लेता है, तो वह इस बदलाव का बड़ा लाभार्थी बन सकता है। एप्पल जैसी कंपनियों ने पहले ही भारत में उत्पादन बढ़ाया है। समझौते के बाद इस प्रक्रिया को गति मिल सकती है।
पिछले दशक में भारतीय विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है। भारत ने किसी एक गुट तक सीमित रहने के बजाय विभिन्न देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संबंध विकसित किए हैं। रूस से तेल खरीदना, अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाना, फ्रांस से लड़ाकू विमान लेना और इजराइल से कृषि तकनीक हासिल करना इसी नीति के उदाहरण हैं। मार्को रुबियो का दौरा इसी बहुध्रुवीय कूटनीति के महत्व को रेखांकित करता है।
कुल मिलाकर, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार का यह नया अध्याय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। यह दो लोकतांत्रिक देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का अवसर है। यदि 500 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल होता है, तो इससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को लाभ मिल सकता है। लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ते समय भारत को अपने किसानों, छोटे उद्योगों और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।














