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संपादकीय
26 Oct, 2026

लिव-इन सेपरेशन: विवाह को बचाए रखते हुए अलग रहने की समझदार राह, तलाक से पहले एक ठहराव की जरूरत

वैवाहिक विवादों में तुरंत तलाक लेने के बजाय न्यायिक पृथक्करण पति-पत्नी को अलग रहकर सोचने, बच्चों की देखभाल सुनिश्चित करने और सुलह की संभावनाएं तलाशने का कानूनी अवसर देता है।

नई दिल्ली, 26 अक्टूबर।

आज के दौर में वैवाहिक जीवन पहले जैसा सरल नहीं रहा है। पति-पत्नी दोनों नौकरी में हैं, दोनों की अपनी सोच है, अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और अपनी सीमाएं भी हैं। ऐसे में रोजमर्रा की टकराहट बढ़ गई है। छोटी-छोटी बातों पर बड़े झगड़े हो जाते हैं और झगड़े बढ़ते-बढ़ते थाने और अदालत तक पहुंच जाते हैं।

अक्सर देखा जाता है कि गुस्से में आकर जोड़े सीधे तलाक की मांग कर देते हैं, जबकि तलाक के बाद जीवन और अधिक कठिन हो जाता है, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए। इस जल्दबाजी को रोकने और रिश्तों को एक और मौका देने के लिए कानून में एक बीच का रास्ता दिया गया है, जिसे न्यायिक पृथक्करण कहा जाता है।

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 10 में इस व्यवस्था का उल्लेख है। इसके अनुसार, पति-पत्नी तलाक लिए बिना अलग-अलग रह सकते हैं। इसमें विवाह समाप्त नहीं होता, बल्कि साथ रहने का दायित्व समाप्त हो जाता है। कोर्ट दोनों की सहमति या परिस्थितियों के आधार पर शर्तें तय कर सकती है, जैसे कौन कहां रहेगा, बच्चों की देखभाल कैसे होगी और खर्च का बंटवारा कैसे होगा। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यदि भविष्य में दोनों के बीच सुलह हो जाए, तो वे फिर से साथ रह सकते हैं। न्यायिक पृथक्करण की डिक्री को रद्द कराया जा सकता है, जबकि तलाक के बाद विवाह बहाल करने के लिए दोबारा शादी करनी पड़ती है। यह लिव-इन रिलेशनशिप नहीं है।

बहुत से लोग भ्रम में रहते हैं कि लिव-इन सेपरेशन और लिव-इन रिलेशनशिप एक ही बात है, जबकि दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। लिव-इन रिलेशनशिप में दो लोग बिना शादी के साथ रहते हैं, जिनके बीच वैवाहिक बंधन नहीं होता, जबकि लिव-इन सेपरेशन में दो लोग शादीशुदा होते हैं और विवाह को बनाए रखते हुए अलग रहते हैं। एक में विवाह के बिना साथ रहने की व्यवस्था होती है, जबकि दूसरे में विवाह को बनाए रखते हुए अलग रहने की। समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर आज भी कई तरह की आपत्तियां हैं, जबकि न्यायिक पृथक्करण एक कानूनी व्यवस्था है।

आज पति-पत्नी दोनों पर काम का दबाव है। घर और बाहर, दोनों की जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में जब दोनों थके-हारे घर आते हैं, तो छोटी-सी बात पर भी विवाद बढ़ जाता है। यदि ऐसे समय में कुछ महीनों का अलगाव मिल जाए, तो दोनों अपने मन को शांत कर सकते हैं और अपनी गलतियों को समझ सकते हैं।

रोज के झगड़ों में बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। वे डर में जीते हैं, पढ़ाई में मन नहीं लगता और कई बार गलत रास्ते पर चले जाते हैं। यदि माता-पिता अलग रहकर शांति से बच्चों से मिलें, तो बच्चों को बेहतर माहौल मिल सकता है।

भारत में आज भी तलाक को कलंक की तरह देखा जाता है, विशेषकर महिलाओं के लिए तलाक के बाद जीवन और कठिन हो जाता है। रिश्तेदार ताने मारते हैं और नौकरी में भी कई बार भेदभाव होता है। न्यायिक पृथक्करण में महिला विवाहित रहती है, इसलिए विवाह की कानूनी स्थिति बनी रहती है। आर्थिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण है। तलाक में अक्सर भरण-पोषण को लेकर लंबी लड़ाई चलती है और कई बार महिलाएं आर्थिक रूप से टूट जाती हैं। न्यायिक पृथक्करण के दौरान भी कानून के अनुसार भरण-पोषण की मांग की जा सकती है और पति की जिम्मेदारी परिस्थितियों के अनुसार बनी रह सकती है।

तलाक की प्रक्रिया का सबसे बुरा पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना होता है। अदालत में पति-पत्नी एक-दूसरे के चरित्र पर उंगली उठाते हैं। झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं। दहेज, घरेलू हिंसा और नाजायज संबंध जैसे आरोपों से पूरा परिवार बदनाम होता है। यह लड़ाई सालों चलती है और अंत में दोनों पक्ष टूट जाते हैं। न्यायिक पृथक्करण में भी कानूनी आधार और आवश्यक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है, लेकिन इसका उद्देश्य विवाह को तत्काल समाप्त किए बिना अलग रहने का विकल्प देना है। इससे कड़वाहट कम करने और भविष्य में सुलह की गुंजाइश बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

नई पीढ़ी में विवाह को लेकर डर बढ़ रहा है। इसका एक कारण तलाक के बढ़ते मामले भी हैं। सोशल मीडिया पर रोज तलाक की खबरें देखकर युवा सोचते हैं कि शादी एक जाल है। इस डर के कारण कई युवा शादी से बच रहे हैं या लिव-इन में रहना पसंद कर रहे हैं। यदि समाज में यह संदेश जाए कि शादी में कोई समस्या आने पर तुरंत तलाक लेने के बजाय एक बीच का रास्ता भी है, तो युवाओं का विवाह पर भरोसा बढ़ेगा। उन्हें लगेगा कि शादी कोई जेल नहीं है, जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं, बल्कि यह एक ऐसा बंधन है जिसमें सांस लेने की जगह भी है।

अक्सर थानों में पति-पत्नी के झगड़े आते हैं। पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज कर देती है या महिला थाने में काउंसलिंग के नाम पर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। यदि पुलिस और काउंसलर इस विकल्प के बारे में जागरूक हों, तो कई परिवार टूटने से बच सकते हैं। अदालतों में भी तलाक के मामलों का बोझ बहुत अधिक है। यदि न्यायाधीश उचित मामलों में शुरुआत में ही न्यायिक पृथक्करण के विकल्प पर विचार करने की सलाह दें, तो कई मामलों में सुलह की गुंजाइश बन सकती है। इससे अदालत का समय भी बच सकता है और परिवारों को भी एक अवसर मिल सकता है। वकीलों की भी जिम्मेदारी है कि वे केवल फीस के लिए तलाक की सलाह न दें, बल्कि अपने मुवक्किलों को सभी विकल्प समझाएं। एक अच्छा वकील वही है, जो रिश्ता बचाने की संभावनाओं पर भी विचार करे।

न्यायिक पृथक्करण को सार्थक बनाने के लिए कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है। अलग रहते हुए भी संवाद पूरी तरह बंद नहीं होना चाहिए। सप्ताह में एक बार बच्चों या जरूरी विषयों पर बातचीत होती रहनी चाहिए। अलग रहने का अर्थ यह नहीं है कि वैवाहिक जिम्मेदारियों को भुलाकर किसी गलत रास्ते पर चला जाए। यदि इस दौरान किसी ने नया संबंध बना लिया, तो सुलह की गुंजाइश खत्म हो सकती है।

परिवार के बड़ों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। उन्हें आग में घी डालने के बजाय दोनों को शांत करने का काम करना चाहिए। इस दौरान आत्ममंथन जरूरी है। अपनी गलती स्वीकार करना और दूसरे की अच्छाइयों को याद करना ही इस अलगाव को सार्थक बना सकता है।

हमारे समाज में आज भी अलग रहने को बुरा माना जाता है। लोग तरह-तरह की बातें बनाते हैं और खासकर महिला को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। इस सोच को बदलना होगा। अलग रहना कोई पाप नहीं है, बल्कि यह खुद को और रिश्ते को समझने का मौका भी हो सकता है।

जिस तरह शरीर में चोट लगने पर आराम दिया जाता है, उसी तरह रिश्ते में चोट लगने पर भी कुछ समय का ठहराव जरूरी हो सकता है। यह ठहराव ही न्यायिक पृथक्करण का उद्देश्य है।

शादी कोई कागज का टुकड़ा नहीं है, जिसे जब चाहे फाड़ दिया जाए। यह दो लोगों के साथ दो परिवारों और आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी है। इसलिए इसे तोड़ने से पहले हर संभव कोशिश करनी चाहिए।

न्यायिक पृथक्करण इसी कोशिश का एक माध्यम है। यह कहता है कि लड़ना है तो तलवार से नहीं, बल्कि थोड़ा दूर हटकर सोचो। यदि फिर भी साथ आना संभव न हो, तो सम्मान के साथ अलग होने का निर्णय लिया जा सकता है, लेकिन एक मौका खुद को जरूर देना चाहिए। आज जब रिश्ते तेजी से टूट रहे हैं, तब यह कानूनी व्यवस्था एक दीये की तरह है, जो अंधेरे में रास्ता दिखा सकती है। जरूरत है कि हम इस दीये को बुझने न दें और रिश्तों को संभलने का अवसर दें। यही समझदारी है और यही आधुनिक समाज की परिपक्वता है।

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मित्तव्ययता रखें क्योंकि रुपये-पैसों की सुविधा आगे मिले न मिले। व्यापार में स्थिति नरम रहेगी। संतोष रखने से सफलता मिलेगी। जीवनसाथी का परामर्श लाभदायक रहेगा। समय नकारात्मक परिणाम देने वाला बना रहेगा। बचते-बचते कलह विवाद का डर बना रहेगा। शुभांक-4-5-7

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