बिलासपुर, 26 अक्टूबर।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत दो दिवसीय प्रवास पर बिलासपुर पहुंचे और बौद्धिक वर्ग को संबोधित किया। उनका संदेश स्पष्ट था कि राष्ट्र निर्माण में योगदान ही स्वयंसेवक का ध्येय है। समाज से लेना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए योगदान देना ही स्वयंसेवक का उद्देश्य है। देश के विखंडनकारी प्रयासों के खिलाफ संघ के लगातार काम करने और संगठनात्मक ढांचे के पुनर्गठन की चर्चा भी इस प्रवास के दौरान हुई। बिलासपुर रेलवे स्टेशन से कड़ी सुरक्षा के बीच बाहर निकलते संघ प्रमुख की तस्वीर भी प्रकाशित हुई। यह प्रवास संघ की कार्यपद्धति और भविष्य की योजनाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
भागवत ने कहा कि संघ और स्वयंसेवक एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस तरह ऑक्सीजन और हाइड्रोजन मिलकर पानी बनाते हैं, उसी तरह संघ और स्वयंसेवक मिलकर समाज निर्माण का कार्य करते हैं। यह उपमा व्यक्ति और संगठन के संबंध को स्पष्ट करती है। व्यक्ति अकेले भी अच्छा हो सकता है, लेकिन संगठन से जुड़कर उसका योगदान व्यापक बन सकता है। संघ का यही मूल सिद्धांत है, व्यक्ति निर्माण से समाज निर्माण और समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण।
आज के समय में हर कोई समाज से कुछ न कुछ लेने की होड़ में है। नौकरी, सम्मान और पद की आकांक्षा के बीच संघ का संदेश है कि लेना नहीं, देना सीखें। स्वयंसेवक शाखा में अपना समय और श्रम देता है तथा समाज के लिए कार्य करता है। जब स्वार्थ की राजनीति बढ़ रही हो, तब राष्ट्र के लिए योगदान देने का विचार विशेष महत्व रखता है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अपना जीवन समाज को संगठित करने के विचार को समर्पित किया।
भागवत ने देश के विखंडनकारी प्रयासों के खिलाफ संघ के लगातार काम करने की बात कही। जाति, भाषा, प्रांत और धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशों के बीच सामाजिक एकता का महत्व बढ़ जाता है। भारत विविधताओं का देश है, लेकिन उसकी एकता बनाए रखना आवश्यक है। संघ की शाखाओं में सामूहिक खेल, गीत और गतिविधियों के माध्यम से अनुशासन तथा संगठन की भावना विकसित करने का प्रयास किया जाता है।
बिलासपुर प्रवास के दौरान छत्तीसगढ़ में संघ के संगठनात्मक ढांचे के पुनर्गठन पर भी चर्चा हुई। राज्य में कार्य को अधिक प्रभावी बनाने के लिए संभागीय स्तर पर इकाइयों के गठन और प्रत्येक संभाग में 22 पदाधिकारियों की कार्ययोजना पर विचार किया गया। इसका उद्देश्य संगठनात्मक गतिविधियों को अधिक व्यवस्थित बनाना और कार्य को व्यापक स्तर पर पहुंचाना है।
आज का युवा नौकरी और करियर के दबाव में समाज के लिए समय निकालने में कठिनाई महसूस करता है। ऐसे में प्रतिदिन एक घंटा समाज के लिए देने का विचार महत्वपूर्ण है। स्वच्छता अभियान, रक्तदान और आपदा के समय सहायता जैसे कार्य सामाजिक योगदान के उदाहरण हैं।
डॉ. मोहन भागवत का बिलासपुर प्रवास केवल एक दौरा नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों को उनके उद्देश्य की याद दिलाने का अवसर था। राष्ट्र निर्माण में योगदान ही स्वयंसेवक का ध्येय है। जब व्यक्ति यह सोचने लगेगा कि उसने समाज को क्या दिया, तभी सामूहिक विकास का मार्ग मजबूत होगा।














