नई दिल्ली, 26 अक्टूबर।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा की कीमतों में तेजी का असर भारत के प्राकृतिक गैस आयात बिल पर पड़ा है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल से सितंबर अवधि में भारत का आयात बिल 23 प्रतिशत बढ़कर 8.5 अरब डॉलर हो गया। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 6.9 अरब डॉलर था। सरकारी पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ के आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई है।
आयात बिल में बढ़ोतरी की मुख्य वजह वैश्विक कीमतों में उछाल रही। हालांकि, इस दौरान तरलीकृत प्राकृतिक गैस के आयात की मात्रा भी 4.4 प्रतिशत बढ़ी। अप्रैल-सितंबर में एलएनजी आयात 18,189 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 17,414 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर था।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के कारण खाड़ी क्षेत्र से गैस की आपूर्ति पर असर पड़ा। ऐसे में तेल विपणन कंपनियों को अमेरिका से अधिक एलएनजी मंगानी पड़ी, जिससे परिवहन लागत में भी बढ़ोतरी हुई।
दूसरी ओर, देश में प्राकृतिक गैस का उत्पादन घटा है। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में घरेलू उत्पादन 4.4 प्रतिशत गिरकर 16,804 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर रह गया। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 17,585 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर था। इसके पीछे ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लिमिटेड के पुराने होते गैस क्षेत्रों को प्रमुख कारण बताया गया है।
इस अवधि में प्राकृतिक गैस की कुल खपत लगभग स्थिर रही। अप्रैल-सितंबर में यह 34,769 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में 34,773 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर थी।
आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भारत की प्राकृतिक गैस के लिए आयात निर्भरता बढ़कर 52.3 प्रतिशत हो गई। पिछले वर्ष यह 50.1 प्रतिशत थी। सितंबर में आयात बिल करीब 1.2 अरब डॉलर पर लगभग स्थिर रहा, लेकिन आयात की मात्रा 8.5 प्रतिशत घटकर 2,957 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर रह गई। पिछले वर्ष सितंबर में यह 3,233 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर थी।
पश्चिम एशिया में संघर्ष और लाल सागर क्षेत्र में बढ़ते समुद्री जोखिम ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं। यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों के बाद समुद्री परिवहन पर दबाव बढ़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के साथ लाल सागर भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक प्रमुख जोखिम क्षेत्र बनकर उभरा है।














