उज्जैन, 30 अक्टूबर।
मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में शुक्रवार की भोर में भगवान महाकाल की भस्म आरती पारंपरिक रीती-रिवाज तथा भव्य श्रृंगार के साथ पूरी हुई। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि पर सुबह चार बजते ही मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। बाबा महाकाल के दिव्य दर्शन पाने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचे भक्तों से पूरा मंदिर प्रांगण 'जय श्री महाकाल' के गूंजते उद्घोष से भक्तिमय हो उठा।
कपाट खुलने के उपरांत सबसे पहले सभा मंडप में विराजमान वीरभद्रजी के कान में स्वस्ति वाचन की प्रक्रिया संपन्न हुई। घंटाल की ध्वनि के साथ भगवान से अनुमति ली गई, जिसके पश्चात सभा मंडप के चांदी के द्वार खोले गए। गर्भगृह में पहुंचकर पुजारियों ने बाबा का पुराना श्रृंगार उतारा और वहां स्थापित अन्य देव-प्रतिमाओं का पूजन किया। इसके बाद जल से स्नान कराकर दूध, दही, घी, शक्कर, शहद एवं फलरस के मेल से तैयार पंचामृत से भगवान का अभिषेक किया गया। फिर कपूर आरती उतारी गई।
भस्म अर्पण से पूर्व बाबा महाकाल का रजत निर्मित चंद्र-त्रिशूल तथा मुकुट से मनमोहक अलंकरण किया गया। साथ ही शेषनाग का चांदी का मुकुट, मुंडमाल एवं रुद्राक्ष की मालाएं धारण कराई गईं। भांग, चंदन, सूखे मेवे और महकते पुष्पों से बाबा का भव्य रूप सजाया गया। आभूषणों व फूलों से आच्छादित महाकाल का यह स्वरूप भक्तों को निहाल कर रहा था। पूजा के उपरांत मिष्ठान और फलों का भोग अर्पण किया गया।
विधान के तहत भस्म चढ़ाने से पूर्व प्रथम घंटाल बजाकर भगवान को हरिओम का जल समर्पित किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिवस्वरूप का ध्यान किया गया। तत्पश्चात ज्योतिर्लिंग को स्वच्छ वस्त्र से ढंककर महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा अनुसार भस्म अर्पित की गई। ऐसी धार्मिक धारणा है कि भस्म अर्पण के पश्चात महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन प्रदान करते हैं।
आरती में सम्मिलित श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के रूप का दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया। संपूर्ण आरती के दौरान पांडाल जयकारों से गूंजता रहा। दर्शन के पश्चात श्रद्धालुओं ने नंदी महाराज के समक्ष शीश नवाया और उनके कान में अपनी मनोकामनाएं कहीं। मान्यताओं के अनुसार नंदीजी के कान में कही गई बात सीधे महाकाल तक पहुंच जाती है। इसी आस्था के भाव में सुबह की भस्म आरती संपन्न हुई।















