समिति के अंतर्गत दो अलग-अलग परिषदों का गठन किया गया है। इनमें विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद शामिल हैं। विद्वत परिषद में आचार्यों, शास्त्रों के जानकारों और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को जगह दी जाएगी। इसमें सिख, जैन और बौद्ध परंपराओं के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
विद्वत परिषद धार्मिक ग्रंथों में कथित मिलावट, प्रक्षेपण और विकृतियों से जुड़े विषयों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट संत-संन्यासी परिषद को सौंपेगी। इसके बाद समिति का मार्गदर्शक मंडल रिपोर्ट की समीक्षा करेगा और अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
संत-संन्यासी परिषद के संयोजक का दायित्व आचार्य महासभा के स्वामी परमात्मानंद को दिया गया है। वहीं, विद्वत परिषद की जिम्मेदारी केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी संभालेंगे।
इस दौरान योग ऋषि स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की ओर से लिखित वैज्ञानिक ग्रंथ 'वैदिक आख्यान विज्ञान' का विमोचन भी किया गया।
शास्त्रों में मिलावट को लेकर स्वामी रामदेव ने जताई चिंता
स्वामी रामदेव ने कहा कि वेदों के विरुद्ध आचरण करने और गौहत्या में शामिल लोगों का सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग कथित मिलावटी शास्त्रों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपकरणों का उपयोग कर देवी-देवताओं तथा राम, सीता, ब्रह्मा, शिव और कृष्ण के बारे में गलत बातें फैला रहे हैं।
उन्होंने कहा कि विद्वानों ने प्रयासों से वेदों को प्रक्षेपण से सुरक्षित रखा है। उनके अनुसार, भारत को आर्थिक और वैचारिक रूप से कमजोर करने के लिए जाति, भाषा और आर्य-द्रविड़ के नाम पर समाज को बांटने के प्रयास किए गए।
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि विकृत इतिहास का सनातन दृष्टिकोण से पुनर्लेखन करने का काम पतंजलि में चल रहा है। शास्त्र शुद्धि अभियान को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।
संतों और धर्माचार्यों ने किया समिति का समर्थन
कार्ष्णि पीठाधीश्वर गुरु शरणानंद ने कहा कि समिति में ऐसे विद्वानों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनका आचरण शुद्ध हो और जो नियमित रूप से त्रिकाल संध्या करते हों। मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्र दास ने सनातन परंपरा के खिलाफ लगाए जाने वाले आरोपों का विरोध करने की बात कही। उन्होंने वेदों को सर्वोच्च प्रमाण बताया।
जूना पीठाधीश्वर अवधेशानंद गिरि ने ऑनलाइन संबोधन में कहा कि धर्मग्रंथों में भेदभाव और द्वेष पैदा करने के उद्देश्य से बाद में कुछ बातें जोड़ी गईं। उन्होंने इस विषय पर सभी प्रमुख धर्माचार्यों के एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता बताई।
विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि सनातन परंपरा समानता का संदेश देती है और किसी को अछूत मानकर भेदभाव करना भगवान का अपमान है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने कहा कि सनातन परंपरा केवल सहनशीलता तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी को स्वीकार करने की भावना रखती है।
सम्मेलन में ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती, स्वामी गोविंददेव गिरि, स्वामी चिदानंद सरस्वती, साध्वी ऋतंभरा और महंत रविंद्र पुरी सहित 40 से अधिक विद्वानों ने भाग लिया। देशभर के 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति भी सम्मेलन में शामिल हुए। उपस्थित प्रतिनिधियों ने शास्त्रों की प्रामाणिकता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।















