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संपादकीय
02 Nov, 2026

धरती जल रही है और उद्योगपतियों की जेबें भर रही हैं: सुपर रिच की कार्बन डकैती पर तीखा प्रहार, सबसे बड़ा झूठ: ग्लोबल वार्मिंग सबकी जिम्मेदारी है

ऑक्सफैम की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे अमीर लोगों का अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषणकारी निवेश जलवायु संकट को गहरा रहे हैं, जिसका सबसे गंभीर असर गरीब और कमजोर समुदायों पर पड़ रहा है।

भोपाल, 02 नवंबर।

बरसों से हमें एक झूठ पढ़ाया गया कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए हम सब जिम्मेदार हैं। आपने पॉलिथीन इस्तेमाल की, आपने गाड़ी चलाई, आपने एसी चलाया, इसलिए धरती गर्म हो रही है। ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट ‘डिजास्टर डिवाइड’ ने इस झूठ को बेनकाब कर दिया है। रिपोर्ट कहती है कि दुनिया के सबसे अमीर 0.1 प्रतिशत लोग बाकी 99.9 प्रतिशत की तुलना में 400 गुना ज्यादा जलवायु तबाही मचा रहे हैं। दुनिया के 80 लाख सुपर रिच लोगों का कार्बन प्रदूषण 3.5 अरब लोगों के कुल प्रदूषण से ज्यादा है। यानी एक तरफ 80 लाख लोग धरती को फूंक रहे हैं और दूसरी तरफ 3.5 अरब लोग उसकी सजा भुगत रहे हैं। यह जलवायु संकट नहीं है, यह जलवायु अपराध है और अपराधी साफ दिखाई दे रहा है।

आंकड़े नहीं, यह लूट का बहीखाता है: कौन कितना जलाता है

रिपोर्ट के आंकड़े देखिए और गुस्सा कीजिए। सबसे धनी 0.1 प्रतिशत लोग दुनिया की कुल आबादी में आटे में नमक के बराबर हैं, लेकिन कुल कार्बन उत्सर्जन का 7 प्रतिशत अकेले डकार जाते हैं। सबसे धनी 1 प्रतिशत लोग 19 प्रतिशत प्रदूषण फैलाते हैं। सबसे धनी 10 प्रतिशत लोग 59 प्रतिशत प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं।

और नीचे देखिए, मध्यम आय वाले 40 प्रतिशत लोगों की हिस्सेदारी 46 प्रतिशत है, क्योंकि उन्हें जीना है। सबसे गरीब 50 प्रतिशत लोग, जिनके पास पहनने को ढंग के जूते नहीं हैं, उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 9 प्रतिशत है।

मतलब साफ है, जो सबसे कम खाता है, वह सबसे कम उत्सर्जन भी करता है, पर सजा उसी को मिल रही है। जो सबसे ज्यादा उड़ता है, वह सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाता है, लेकिन कुर्सी पर वही बैठा है।

याट, जेट और महलों की हवस: इनकी ऐशो-आराम गरीब की मौत है

इन सुपर रिच लोगों की जीवनशैली किसी राक्षस की भूख जैसी है। एक व्यक्ति के पास पांच महल हैं। हर महल साल के 365 दिन एयर कंडीशनिंग पर चलता है। एक महल का एक दिन का बिजली खर्च किसी अफ्रीकी गांव के पूरे महीने के खर्च से ज्यादा है। इनके पास प्राइवेट जेट हैं। एक प्राइवेट जेट की दो घंटे की उड़ान एक आम भारतीय के पूरे साल के कार्बन उत्सर्जन से ज्यादा प्रदूषण छोड़ सकती है। रिपोर्ट कहती है कि एक प्राइवेट जेट का सिर्फ दो सेकंड का उत्सर्जन एक आम व्यक्ति के पूरे साल के उत्सर्जन के बराबर है। सोचिए, आप साल भर साइकिल चलाते हैं, बस में धक्के खाते हैं और यह आदमी दो सेकंड में आपका पूरा हिसाब बराबर कर देता है।

इनके पास सुपर याट हैं। एक सुपर याट एक हफ्ते में जितना डीजल पीती है, उतना एक मछुआरा अपनी पूरी जिंदगी में नहीं पीता। इनका फैशन, इनका खाना, इनका कुत्ता भी कार्बन उत्सर्जन करता है। इनका कुत्ता भी बिजनेस क्लास में उड़ता है।

यह विलासिता नहीं है, यह सामूहिक हत्या की तैयारी है।

सबसे बड़ा खेल निवेश का धुआं: पैसा इनका और धुआं गरीब के फेफड़ों में

यदि जीवनशैली अपराध है, तो निवेश महाअपराध है। ये लोग तेल, कोयला, गैस, सीमेंट, हथियार और फास्ट फैशन कंपनियों के मालिक हैं या इनमें पैसा लगाते हैं। ये कंपनियां धरती खोदती हैं, तेल निकालती हैं, कोयला जलाती हैं, नदियां सुखाती हैं और जंगल काटती हैं। मुनाफा इनकी जेब में जाता है। धुआं किसके हिस्से आता है? बिहार के किसान के खेत में बाढ़ बनकर, बुंदेलखंड के सूखे में, असम के डूबते गांवों में और मुंबई की धंसती झोपड़ियों में।

ऑक्सफैम ने इसे बिल्कुल सही कहा है कि धनी लोग दर्द देकर मरहम लगाने का काम करते हैं। पहले ये प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों में निवेश करके अरबों कमाते हैं। फिर जब बाढ़ आती है और सूखा पड़ता है, तो यही लोग बीमा कंपनियों, निजी अग्निशमन सेवाओं, जलापूर्ति कंपनियों और बंकर बनाने वाली कंपनियों में निवेश करके फिर अरबों कमाते हैं। यानी बीमारी भी इनकी और दवाई भी इनकी, मरीज सिर्फ गरीब है।

दोहरी दुनिया का नंगा सच: एक के लिए बंकर, दूसरे के लिए कफन

जलवायु परिवर्तन का सबसे घिनौना चेहरा यह है कि सुरक्षा भी अब बिकाऊ है। जब समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, तो सुपर रिच के पास न्यूजीलैंड में बंकर होंगे, हवाई में पहाड़ी पर महल होंगे। उनके पास निजी अग्निशमन दल होंगे, जो उनके महलों को बचाएंगे। उनके पास डॉक्टरों की पूरी टीम होगी, जो उनके लिए साफ हवा का इंतजाम करेगी। उनके पास तो मंगल पर जाने का टिकट भी बुक है।

और गरीब के पास क्या है? रिपोर्ट कहती है कि 2050 तक 100 करोड़ लोग विस्थापित होंगे, यानी 100 करोड़ लोग अपना घर छोड़ने पर मजबूर होंगे। वे कहां जाएंगे? उनके लिए कोई बंकर नहीं है, कोई वीजा नहीं है। उनके सामने समुद्र है या रेगिस्तान, तंबू है या मौत।

एक तरफ सुपर रिच खुद को सुरक्षित कर लेते हैं, दूसरी तरफ गरीब अपनी जमीन, फसल और जीवन से हाथ धो बैठता है। यही तो ‘डिजास्टर डिवाइड’ है, आपदा का बंटवारा। आपदा सबके लिए एक जैसी नहीं है, उसका सबसे बड़ा बोझ गरीब पर पड़ता है।

सरकारें क्यों चुप हैं: चंदे और धंधे का गठजोड़

सरकारें इन पर हाथ क्यों नहीं डालतीं? इनके जेट पर टैक्स क्यों नहीं लगता? इनकी याट पर भारी कर क्यों नहीं लगाया जाता? जवाब सीधा है, ये ही लोग चुनावी चंदा देते हैं, ये ही लोग थिंक टैंक चलाते हैं, ये ही लोग मीडिया खरीदते हैं और ये ही लोग बताते हैं कि विकास क्या है। इनके लिए कार्बन टैक्स विकास विरोधी है, इनके लिए पर्यावरण कानून तरक्की में बाधा है।

सरकार गरीब से कहती है कि आप एक पौधा लगाइए और अमीर से कहती है कि आप एक और तेल का कुआं खोद लीजिए। यह नीति नहीं है, यह दलाली है।

अब क्या होना चाहिए: लगाम लगानी होगी, वरना सब डूबेंगे

बहुत हो गया ज्ञान, अब कार्रवाई चाहिए। इनके कार्बन उत्सर्जन पर भारी कर लगाओ। प्राइवेट जेट पर 500 प्रतिशत टैक्स, सुपर याट पर 500 प्रतिशत टैक्स और कई महलों पर कार्बन सरचार्ज लगाओ। प्रदूषण फैलाने वाले निवेश पर भारी जुर्माना लगाओ। इस पैसे को गरीब देशों को दो, जो देश डूब रहे हैं, जो देश जल रहे हैं, उनके लिए जलवायु कोष बनाओ। यह भीख नहीं है, यह हर्जाना है।

जीवाश्म ईंधन कंपनियों में निवेश को बढ़ावा देना बंद करो। इनकी जवाबदेही तय करो। जलवायु विस्थापितों के लिए वैश्विक नागरिकता और पुनर्वास की व्यवस्था बनाओ। यदि तुम्हारे धुएं से किसी का घर डूबा है, तो उसे बसाने की जिम्मेदारी भी तुम्हारी है।

यदि यह नहीं हुआ, तो समझ लीजिए कि धरती सिर्फ गर्म नहीं होगी, धरती फटेगी। और जब फटेगी, तो न बंकर बचेगा, न महल, क्योंकि धरती सबकी है, ऑक्सीजन सबकी है और जब ऑक्सीजन ही जहरीली हो जाएगी, तो सोने की ईंट भी सांस नहीं दे पाएगी।

यह लड़ाई पर्यावरण की नहीं है, यह लड़ाई इंसाफ की है।

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आज का राशिफल

समय नकारात्मक परिणाम देने वाला बन रहा है। ले देकर की जा रही काम की कोशिश ठीक नहीं। कार्यक्षेत्र में आगे बढऩे में रुकावट का एहसास होगा। विरोधियों के सक्रिय होने की संभावना है। कारोबारी यात्रा को फिलहाल टालें। जो चल रहा है उसे सावधानीपूर्वक संभालें। शुभांक-1-3-6

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