Naidunia Live
• टॉप न्यूज़ • मध्य प्रदेश • विज्ञान व प्रौद्योगिकी • अपराध • शिक्षा • संपादकीय • धर्म / अध्यात्म • वीडियो स्टोरी • मौसम • त्योहार • प्रेरक कहानियाँ
• वीडियो • न्यूज़ आर्काइव
संपादकीय
04 Nov, 2026

हिमालय में तकनीक की पहरेदारी: बर्फ की छत पर खतरे की आहट

लाहौल-स्पीति की घेपन घाट झील पर स्थापित देश की पहली प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली हिमनद झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा समय रहते बताने में मदद करेगी।

लाहौल-स्पीति, 04 नवंबर।

हिमालय केवल पहाड़ नहीं है, यह भारत की जलवायु का नियंता और करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। पर यही हिमालय अब बड़े खतरे का सामना कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और उनके पिघलने से हिमनद झीलें बन रही हैं। ये झीलें दिखने में खूबसूरत लगती हैं, लेकिन इनके भीतर प्रलय छिपी है। जब ये झीलें टूटती हैं, तो नीचे बसे गांव, शहर और सड़कें पल भर में बह जाती हैं। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ कहा जाता है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड और सिक्किम में इसका भयावह रूप देखने को मिला है। इसी खतरे से निपटने के लिए पहली बार हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में देश की पहली प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की गई है।

समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन घाट हिमनद झील को इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए चुना गया है। इस झील का आकार लगातार बढ़ रहा है और इसरो ने नवंबर 2023 में ही इसके बढ़ते खतरे को लेकर आगाह किया था। खतरे का आकलन, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर काम शुरू हुआ था। उसी का परिणाम यह नई प्रणाली है। इसे सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग यानी सी-डैक ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की पायलट परियोजना के तहत विकसित किया है। यह केवल एक मशीन नहीं, बल्कि बर्फ के बीच मानव की आंख और कान है।

इस प्रणाली में तीन मुख्य हिस्से हैं। पहला, बुआय आधारित झील निगरानी स्टेशन, जो झील के बीच तैरता रहेगा और लगातार जलस्तर मापेगा। दूसरा, स्वचालित मौसम केंद्र, जो आसपास के तापमान, हवा की गति, बर्फबारी और धूप का हिसाब रखेगा। तीसरा, ग्लेशियर विजन यूनिट, जो कैमरों और सेंसरों के माध्यम से ग्लेशियर की हलचल और दरारों पर नजर रखेगा। इनसे मिलने वाले आंकड़ों और दृश्य सूचनाओं का विश्लेषण सी-डैक के सुपरकंप्यूटर प्लेटफॉर्म पर किया जाएगा। निर्धारित मानकों के आधार पर अलर्ट जारी होगा, जिससे प्रशासन को संभावित आपदा से पहले तैयारी करने का समय मिल सकेगा।

संभावित बाढ़ से निपटने के लिए चंद्रा-चिनाब क्षेत्र में भी उच्चतम बाढ़ स्तर के चिह्नांकन का काम पूरा कर लिया गया है। इससे बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों की पहचान करने और राहत एवं बचाव की योजना बनाने में मदद मिलेगी। भविष्य में इस चेतावनी प्रणाली को जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी स्थापित करने की जरूरत है, क्योंकि वहां भी हिमनद झीलों के फटने का गंभीर खतरा है।

इस खतरे की गंभीरता समझने के लिए आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 2,485 से अधिक हिमनद झीलों की पहचान की गई है। इनमें से 221 झीलों को बेहद संवेदनशील और उच्च खतरे की श्रेणी में रखा गया है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन भी हिमनद झीलों में हो रहे बदलावों की गंभीरता की ओर ध्यान दिलाते हैं। पहले जिन प्रक्रियाओं में सदियां लगती थीं, वे अब कुछ ही वर्षों में तेजी से सामने आ रही हैं। ऐसे में चेतावनी प्रणाली समय की बड़ी मांग है।

यह प्रणाली केवल तकनीक की जीत नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन की सोच में बदलाव का भी प्रतीक है। पहले आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने पर जोर रहता था, अब उसके प्रभाव को पहले से कम करने की कोशिश हो रही है। हिमालय में, जहां ऑक्सीजन कम है, तापमान शून्य से नीचे रहता है और पहुंचना बेहद कठिन है, वहां स्वचालित प्रणाली स्थापित करना इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धि है। सौर ऊर्जा से चलने वाली यह प्रणाली उपग्रह के माध्यम से आंकड़े भेजेगी। इसके संचालन के लिए हर समय किसी व्यक्ति की वहां मौजूदगी जरूरी नहीं होगी।

लाहौल-स्पीति के लोगों के लिए यह प्रणाली जीवनरक्षक साबित हो सकती है। यहां के किसान, चरवाहे और पर्यटन से जुड़े लोग बाढ़ के खतरे का सामना करते हैं। झील टूटने से उनकी फसलें, घर और सड़कें बह सकती हैं। समय पर सूचना मिलने से वे सुरक्षित स्थानों पर जा सकेंगे और अपने पशुओं को भी बचा सकेंगे। इस तरह तकनीक जीवन के साथ आजीविका की रक्षा में भी सहायक होगी।

घेपन घाट पर स्थापित यह प्रणाली केवल शुरुआत है। इसे पूरे हिमालय में लागू करने के लिए पर्याप्त निवेश और राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है। केंद्र और राज्य सरकारों को संवेदनशील झीलों की निगरानी के लिए स्थायी बजट बनाना चाहिए। स्कूलों में बच्चों को जीएलओएफ के बारे में पढ़ाया जाए और पंचायत स्तर पर आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाए। विज्ञान अकेले पहाड़ नहीं बचा सकता, जब तक स्थानीय लोग जागरूक नहीं होंगे, तकनीक का पूरा लाभ नहीं मिलेगा। हिमालय की बर्फीली चादर के नीचे छिपे खतरे को पहचानने और समय रहते कार्रवाई करने में यह चेतावनी प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

|
वीडियो फीचर

लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ’ के संकल्प के साथ आज भोपाल में निकलेगी BJP की विशाल पदयात्रा


भोपाल में पहली बार एशियन वूमेंस हॉकी चैंपियंस ट्रॉफी-2026, 6 देशों की टीमें दिखाएंगी दमखम

आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के विरोध में देशव्यापी हड़ताल, 10 हजार से अधिक कर्मचारी शामिल

IDBI बैंक के निजीकरण के खिलाफ देशव्यापी हड़ताल, 10 हजार कर्मचारी शामिल

देवास में टीआई दिलीप पुरी को अंतिम विदाई

देवास शराब कांड पर सियासत तेज, मंत्री सारंग ने कांग्रेस को घेरा

आज का राशिफल

समय नकारात्मक परिणाम देने वाला बन रहा है। ले देकर की जा रही काम की कोशिश ठीक नहीं। कार्यक्षेत्र में आगे बढऩे में रुकावट का एहसास होगा। विरोधियों के सक्रिय होने की संभावना है। कारोबारी यात्रा को फिलहाल टालें। जो चल रहा है उसे सावधानीपूर्वक संभालें। शुभांक-1-3-6

आज का मौसम

भोपाल

19° / 30°

Sunny

ट्रेंडिंग न्यूज़