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वाइल्ड लाइफ
04 Nov, 2026

छत्तीसगढ़ के ऋषिझरन जंगल में मिलीं मकड़ियों की दो दुर्लभ प्रजातियां, पहली बार दर्ज हुआ वैज्ञानिक रिकॉर्ड

गरियाबंद के देवभोग स्थित ऋषिझरन जंगल में शोधकर्ताओं ने स्टीटोडा सिंगुलटा और थेरिडुला गोनीगैस्टर मकड़ियों की मौजूदगी दर्ज की है। छत्तीसगढ़ में इन दोनों प्रजातियों और इनके संबंधित वंश का यह पहला वैज्ञानिक रिकॉर्ड है।

गरियाबंद, 04 नवंबर।

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के देवभोग क्षेत्र स्थित ऋषिझरन जंगल में मकड़ियों की दो दुर्लभ प्रजातियां मिली हैं। शोध के दौरान स्टीटोडा सिंगुलटा और थेरिडुला गोनीगैस्टर की मौजूदगी दर्ज की गई। छत्तीसगढ़ में इन दोनों प्रजातियों और इनके संबंधित वंश का यह पहला आधिकारिक वैज्ञानिक रिकॉर्ड है।

इस खोज से जुड़ा शोध अध्ययन अक्टूबर 2026 में अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘एप्लाइड एंटोमोलॉजी एंड इनोवेशन’ में प्रकाशित हुआ है। देवभोग क्षेत्र के जंगलों में किए गए सर्वे के दौरान शोधकर्ताओं ने इन मकड़ियों को सुरक्षित रूप से एकत्र किया।

शोध दल में डॉ. अविनाश आर. निचाट, हितेश कुमार वारते, माणिक चंद बंजारे और यशवंत नायक शामिल थे। टीम में प्राणीशास्त्र और जीवन विज्ञान से जुड़े प्राध्यापक तथा शोधार्थी शामिल रहे।

छत्तीसगढ़ में पहली बार दर्ज हुआ दोनों वंश का रिकॉर्ड

शोधकर्ताओं के अनुसार, यह अध्ययन मकड़ियों के वर्गीकरण और भौगोलिक वितरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। दोनों प्रजातियों के साथ स्टीटोडा और थेरिडुला वंश का भी राज्य में पहली बार रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। मकड़ियों को गरियाबंद जिले के देवभोग स्थित ऋषिझरन वन क्षेत्र से हाथों द्वारा एकत्र किया गया। यह जंगल ओडिशा की सीमा के समीप है।

दोनों प्रजातियों की शारीरिक बनावट अलग-अलग है। स्टीटोडा सिंगुलटा का उदर गहरे चॉकलेटी रंग का होता है और उसके अगले हिस्से में पीली रेखा दिखाई देती है। वहीं, थेरिडुला गोनीगैस्टर का उदर कालेपन लिए होता है, जिस पर पांच विशिष्ट पीले धब्बे पाए जाते हैं।

एक महीने के अध्ययन के बाद हुई पहचान

शोध दल के सदस्य हितेश कुमार वारते और उनके सहयोगियों ने बताया कि शुरुआत में तस्वीरों के आधार पर मकड़ी की पहचान करना मुश्किल था, क्योंकि भारतीय शोध में इस प्रजाति का पहले कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। इसके बाद टीम ने मकड़ी की शारीरिक संरचना, पैरों की बनावट और उदर पर मौजूद धारियों तथा लंबवत रेखाओं का बारीकी से अध्ययन किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, करीब एक महीने तक वैज्ञानिक शोध पत्रों और उपलब्ध विवरणों का मिलान करने के बाद प्रजातियों की पहचान की पुष्टि हुई।

छत्तीसगढ़ में जाल बनाने वाली मकड़ियों का अब तक सीमित दस्तावेजीकरण हुआ है। ऐसे में यह खोज राज्य की जैव विविधता और मकड़ियों के भौगोलिक वितरण से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी को समृद्ध करेगी। शोध में प्रस्तुत शारीरिक संरचना का विस्तृत विवरण भविष्य में इनकी पहचान और आगे के अध्ययन में भी सहायक होगा।

शोधकर्ताओं का कहना है कि देवभोग और ऋषिझरन के जंगलों में इन प्रजातियों की मौजूदगी छत्तीसगढ़ के वन क्षेत्रों की समृद्ध जैव विविधता को दर्शाती है। आगे के सर्वेक्षणों से राज्य में अन्य नई प्रजातियों और उनके वितरण से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

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