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संपादकीय
05 Nov, 2026

माँ के आँचल पर लगे दाग से बच्चे बाहर आ पाएंगे?

कोलकाता के सोनागाछी में आमरा पादातिक संस्था का केंद्र यौनकर्मियों के बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के साथ बेहतर भविष्य की उम्मीद दे रहा है।

कोलकाता, 05 नवंबर।

कोलकाता की सोनागाछी की तंग गलियों में, जहां दिन भी शाम जैसा लगता है, वहां एक कमरे से बच्चों की हंसी सुनाई देती है। कोई बच्चा रंगों से सूरज बना रहा है, तो कोई पहाड़ा पढ़ रहा है। ये उन माताओं के बच्चे हैं, जिनका नाम सुनकर समाज मुंह फेर लेता है। लेकिन इन बच्चों की हंसी में कोई दाग नहीं है। इनकी आंखों में भी वही सपने हैं, जो हर बच्चे की आंखों में होते हैं। इन्हीं सपनों को सहारा देने के लिए आमरा पादातिक नामक संस्था ने एक ऐसा केंद्र बनाया है, जहां बच्चे दिनभर रहते हैं, खाते हैं, पढ़ते हैं और सबसे बड़ी बात, बिना डर के जीते हैं।

जरा सोचिए, एक बच्चा जब पहली बार स्कूल जाता है और उससे पूछा जाता है कि उसके माता-पिता क्या करते हैं, तो वह क्या जवाब देगा? वह अपनी मां से बेहद प्यार करता है, लेकिन उसके पेशे के बारे में दूसरों को बताने में झिझकता है। कई बार दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते हैं और कभी अनजाने में शिक्षक भी ऐसे सवाल पूछ लेते हैं, जिनसे वह शर्मिंदा हो जाता है। धीरे-धीरे वह स्कूल से दूर होने लगता है। क्या यह न्याय है कि जिस परिस्थिति में पैदा होने पर बच्चे का कोई नियंत्रण नहीं, उसकी सजा भी वही भुगते?

उस मां से पूछिए, जो खुद भूखी रहकर बच्चे का पेट भरती है। वह बस यही चाहती है कि उसका बच्चा उसकी तरह जिंदगी न जिए और उसे वे ताने न सुनने पड़ें, जो उसने सहे हैं। लेकिन रोजी-रोटी के लिए उसे काम पर जाना पड़ता है। कई बार बच्चा अकेला रह जाता है, भूखा रहता है और गलत हाथों में पड़ने का खतरा भी बना रहता है। इसी पीड़ा से ऐसी जगहों की जरूरत महसूस होती है, जहां मां अपने बच्चे को सुरक्षित छोड़कर काम पर जा सके और बच्चा अपनी पहचान के बोझ से मुक्त होकर भविष्य के सपने देख सके।

ऐसे केंद्रों में केवल पढ़ाई नहीं होती, बल्कि बच्चों की परवरिश भी होती है। उन्हें पौष्टिक भोजन, शिक्षा, खेल, संगीत, नृत्य, चित्रकला और मार्शल आर्ट सीखने के अवसर मिलते हैं। जब किसी बच्चे को यह भरोसा मिलता है कि वह भी समाज का बराबर का हिस्सा है, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। प्यार और सम्मान उसके जीवन की दिशा बदल सकते हैं।

हम अक्सर कहते हैं कि हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है, लेकिन यौनकर्मियों के बच्चों की बात आते ही समाज चुप हो जाता है। क्या वे इस देश के बच्चे नहीं हैं? सरकार को ऐसे क्षेत्रों में विशेष डे-केयर केंद्र खोलने चाहिए, जहां पिता के नाम जैसी औपचारिकताओं के कारण बच्चों का दाखिला न रुके। शिक्षकों को भी संवेदनशील व्यवहार के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। समाज को बच्चों की पहचान उनके जन्म या माता के पेशे से नहीं, बल्कि उनकी प्रतिभा और कर्म से करनी चाहिए।

सोनागाछी की यह पहल उम्मीद जगाती है कि सही अवसर मिले, तो हर बच्चा अपना भविष्य बदल सकता है। आज जब हम अपने बच्चों को प्यार से सुलाएं, तब उन बच्चों के बारे में भी सोचें, जो अंधेरे कमरों में अपनी मां का इंतजार करते हैं। उन्हें एक किताब, सुरक्षित बचपन और भरोसे का हाथ देना हमारी जिम्मेदारी है। किसी एक बच्चे को भी सम्मान के साथ जीने और खुले आसमान में उड़ने का अवसर देना ही सच्चा जनसरोकार और मानवता है।

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