लखीमपुर खीरी, 05 नवंबर।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संत कबीर महोत्सव में जो कहा, वह केवल एक जिले का समाचार नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी है। उन्होंने कहा कि असहमति के बावजूद आपसी सम्मान बनाए रखें, वाणी में संयम रखें और आचरण में नैतिकता रखें। यह बात लखीमपुर खीरी में कही गई, लेकिन इसकी गूंज दिल्ली से लेकर दक्षिण भारत तक सुनाई देनी चाहिए, क्योंकि आज भारत का लोकतंत्र एक बड़ी परीक्षा से गुजर रहा है। परीक्षा यह नहीं है कि कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि क्या हम हारने वाले का भी सम्मान कर पाएंगे? क्या हम विरोधी को दुश्मन बनाए बिना बहस कर पाएंगे? यहीं पर कबीर छह सौ साल बाद भी हमारे सबसे बड़े शिक्षक बन जाते हैं।
कबीर का जन्म काशी में हुआ और उनका जीवन मगहर तक पहुंचा, लेकिन उनकी वाणी पूरे हिंदुस्तान में फैल गई। इसका कारण यह है कि कबीर ने किसी क्षेत्र की नहीं, मनुष्य की बात की। वे जुलाहा थे और उन्होंने हिंदू तथा मुस्लिम, दोनों समुदायों के पाखंड पर चोट की। पंद्रहवीं सदी में जब समाज जाति और धर्म के नाम पर बंटा था, तब उन्होंने मनुष्य की समानता का संदेश दिया। आज इक्कीसवीं सदी में भी समाज उन्हीं दीवारों में बंटा है। सोशल मीडिया पर जाति के नाम पर ट्रोल किया जाता है, धर्म के नाम पर नफरत फैलती है और भाषा के नाम पर अहंकार दिखता है। कबीर की वाणी आज भी समानता और सामाजिक सद्भाव का संदेश देती है।
भारत विविधता का देश है। यहां भाषा, भोजन और परंपराएं अलग-अलग हैं। इस विविधता को एकता में बदलने का रास्ता प्रेम और संवाद से निकलता है। कबीर की सधुक्कड़ी भाषा विभिन्न भाषाई परंपराओं के मेल का उदाहरण है। आज जब हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर बहस होती है, तब कबीर याद दिलाते हैं कि भाषा जोड़ने के लिए होती है, तोड़ने के लिए नहीं। उनका दोहा, 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।' आज की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी संदेश है कि ज्ञान के साथ संवेदना और आचरण का होना जरूरी है।
आज लोकसभा और राज्यसभा में बहस से ज्यादा शोर और संवाद से ज्यादा आरोप सुनाई देते हैं। लोकसभा अध्यक्ष का पद सत्ता और विपक्ष, दोनों को साथ लेकर चलने की जिम्मेदारी निभाता है। इसलिए जब ओम बिरला असहमति के बीच गरिमा बनाए रखने की बात कहते हैं, तो यह पूरे देश की संसदीय प्रणाली के लिए संदेश है। कबीर ने काशी के पंडितों से भी सवाल पूछे और मगहर के मौलवियों से भी। उन्होंने व्यंग्य किया, लेकिन घृणा नहीं फैलाई। उनकी आलोचना में भी विवेक और करुणा थी। आज के लोकतंत्र को इसी शैली की जरूरत है। विचारों से लड़ें, व्यक्तियों से नहीं और नीतियों का विरोध करें, लेकिन संवाद के रास्ते बंद न करें।
बिरला ने जिस दोहे का उल्लेख किया, 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।' वह केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बेहतर बनाने का सूत्र भी है। आज नेता, कार्यकर्ता और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता दूसरों में बुराई खोजने में लगे हैं, लेकिन आत्ममंथन के लिए तैयार नहीं हैं। कबीर सिखाते हैं कि आत्मचिंतन से ही विवेक और विनम्रता आती है। सहिष्णुता के बिना लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल सकता है।
कबीर ने श्रम और ईमानदारी को महत्व दिया। उनका दोहा, 'साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।' जरूरत भर संसाधन और दूसरों के प्रति संवेदना का संदेश देता है। आज जब आर्थिक असमानता और भ्रष्टाचार पर बहस होती है, तब कबीर की यह सीख प्रासंगिक हो जाती है कि मेहनत, संतोष और सामाजिक जिम्मेदारी को जीवन का आधार बनाया जाए।
लखीमपुर खीरी में कबीर स्मृति भवन का शिलान्यास केवल एक भवन का निर्माण नहीं, बल्कि उनके विचारों को आगे बढ़ाने का अवसर है। कबीर किसी एक राज्य या क्षेत्र के नहीं, पूरे भारत के हैं। उनकी वाणी को युवाओं तक पहुंचाने और उनके विचारों के माध्यम से समानता, सद्भाव तथा संवैधानिक मूल्यों की समझ विकसित करने की जरूरत है। सरकार को काशी से मगहर तक कबीर से जुड़े स्थलों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक मार्ग की संभावनाओं पर भी विचार करना चाहिए।
कबीर ने कहा था, 'प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाय।' लोकतंत्र में भी अहंकार और असहिष्णुता के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन उसकी महानता तभी सिद्ध होगी, जब वह अपने सबसे कमजोर नागरिक का भी सम्मान करे। कबीर का रास्ता संसद को सड़क से और सत्ता को समाज से जोड़ता है। छह सौ साल पहले एक जुलाहे ने जो चादर बुनी थी, उसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। जरूरत है कि हम उसकी सीख को अपनाएं और असहमति के बीच भी सम्मान बनाए रखने वाला भारत बनाएं।














