नई दिल्ली, 05 नवंबर।
रियल एस्टेट के दिग्गज निरंजन हीरानंदानी ने जो कहा है, वह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि आम आदमी की आर्थिक स्थिति का आईना है। उन्होंने कहा है कि भारत में पचास लाख रुपये से कम कीमत का घर बनाना अब आर्थिक रूप से संभव नहीं रह गया है। यह बात किसी अखबार की सुर्खी नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब का सच है। पहले आदमी सोचता था कि नौकरी लगेगी तो घर बनाएंगे, अब वह सोचता है कि घर खरीदने की कोशिश की तो नौकरी छोड़नी पड़ सकती है। कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि किफायती शब्द ही मजाक बन गया है। आज एक करोड़ रुपये का घर भी किफायती कहलाता है। यह कैसी किफायत है, जो आम आदमी की पहुंच से ही बाहर हो गई है?
लोग सोचते हैं कि मकान सीमेंट और स्टील से महंगा होता है, लेकिन हकीकत यह है कि मकान सरकारी प्रक्रियाओं और शुल्कों के कारण भी महंगा होता है। हीरानंदानी ने कहा है कि मुंबई में चालीस हजार रुपये प्रति वर्गफुट की कीमत में से बीस हजार रुपये सीधे सरकार के पास जाते हैं। स्टांप ड्यूटी, जीएसटी, लेबर सेस, विकास शुल्क और न जाने कितने नामों से पैसा वसूला जाता है। यानी घर की कीमत का बड़ा हिस्सा करों और शुल्कों में चला जाता है। सरकार सबको आवास देने की बात करती है, लेकिन उसी आवास पर भारी कर भी लगाती है।
सस्ते मकान का सबसे बड़ा दुश्मन जमीन की बढ़ती कीमतें हैं। शहरों के बीच जमीन आसमान छू रही है और सरकार उसे सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेच देती है। फिर बिल्डर गरीबों के लिए घर क्यों बनाएगा? वह अमीरों के लिए ऊंची इमारतें बनाएगा। सरकार चाहे तो अपनी जमीन का एक हिस्सा किफायती आवास के लिए आरक्षित कर सकती है, लेकिन राजस्व की प्राथमिकता अक्सर इस जरूरत पर भारी पड़ती है। उद्योगों के लिए जमीन सस्ती दी जाती है, लेकिन गरीब के घर के लिए जमीन महंगी पड़ती है। यही नीति की बड़ी विफलता है।
बिल्डर भी सस्ते घर बनाने में रुचि नहीं दिखाते, क्योंकि महंगे घरों में मुनाफे की संभावना अधिक होती है। यदि पचास लाख रुपये के घर में मुनाफा पांच प्रतिशत और एक करोड़ रुपये के घर में पच्चीस प्रतिशत हो, तो बिल्डर महंगे घर बनाना पसंद करेगा। यह सोच बाजार में किफायती आवास की कमी को और बढ़ाती है।
घर खरीदना मुश्किल हुआ है, तो किराये पर रहना भी आसान नहीं है। बड़े शहरों में किराया इतना बढ़ गया है कि आधी तनख्वाह उसी में चली जाती है। इसके बावजूद किरायेदारों को मकान खाली करने की चिंता बनी रहती है। विदेशों में सरकारें किराये के मकान बनाकर कम दरों पर उपलब्ध कराती हैं। भारत में भी ऐसे मॉडल की जरूरत है, ताकि हर व्यक्ति पर घर खरीदने का दबाव न रहे।
सरकार की सबसे बड़ी गलती यह है कि वह घर को राजस्व का साधन समझती है, जबकि घर बुनियादी जरूरत है। सरकार को अपनी जमीन की नीलामी में कम से कम पच्चीस प्रतिशत हिस्सा किफायती आवास के लिए आरक्षित करना चाहिए। ऐसे घर सालाना छह लाख रुपये से कम आय वाले परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर दिए जा सकते हैं। किफायती घरों पर करों और शुल्कों का बोझ भी कम किया जाना चाहिए, ताकि उनकी कीमत घट सके।
मकान का नक्शा पास कराने की प्रक्रिया भी सरल और समयबद्ध होनी चाहिए। मंजूरी में देरी से निर्माण लागत और ब्याज का बोझ बढ़ता है, जिसका असर अंततः खरीदार पर पड़ता है। रियल एस्टेट को उद्योग का दर्जा देने और सस्ते ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की मांग पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। इसके साथ ही खाली पड़े मकानों को किराये पर उपलब्ध कराने के लिए पारदर्शी व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
आज सवाल केवल घर की कीमत का नहीं, बल्कि इस बात का है कि घर किसके लिए है। यदि घर केवल अमीरों की पहुंच में रह जाएगा, तो सबका साथ, सबका विकास का नारा अधूरा रह जाएगा। सस्ता मकान पहुंच से दूर होना केवल रियल एस्टेट की समस्या नहीं, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक चुनौती है। सरकार को तय करना होगा कि उसे राजस्व के आंकड़े बढ़ाने हैं या लोगों के सिर पर छत सुनिश्चित करनी है। घर ईंट और सीमेंट से ही नहीं बनता, भरोसे से भी बनता है और आम आदमी का वह भरोसा आज टूट रहा है।














