नई दिल्ली, 05 नवंबर।
नई दिल्ली में दो नवंबर को शुरू हुई हलचल आने वाले महीनों में देश की राजनीति की दिशा तय कर सकती है। प्रवेश कुमार मिश्र की रिपोर्ट के अनुसार, इंडिया गठबंधन ने इस बार सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को निशाने पर लेने की रणनीति बनाई है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्था के कंधे पर बंदूक रखकर लोकतंत्र पर निशाना साधा जा रहा है। इसी कारण अब लड़ाई संसद से आगे कस्बों और गांवों की चौपाल तक ले जाने की तैयारी है। अभियान के तहत मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास किया जाएगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार केवल चेहरा हैं और असली पटकथा कहीं और लिखी जा रही है।
विपक्षी दल संसद की कार्यवाही बाधित कर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इंडिया गठबंधन का कहना है कि मतदाता सूची से हटाए गए कथित 13.2 करोड़ से अधिक नामों का मुद्दा बेहद गंभीर है। विपक्ष की रणनीति मतदाताओं के बीच जाकर उन्हें जागरूक करने की है। गठबंधन के रणनीतिकारों ने मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन को व्यापक बनाने की योजना तैयार की है। विपक्ष का आरोप है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था का सहारा लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।
इस अभियान के दौरान राहुल गांधी और गठबंधन के शीर्ष नेता जनता के बीच यह संदेश पहुंचाने का प्रयास करेंगे कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के माध्यम से मतदाताओं की सूची और चुनावी गणित को प्रभावित किया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी विचारधारा का मामला है, जिसमें संस्थाओं को कमजोर कर सत्ता मजबूत करने की कोशिश हो रही है। आंदोलन का अगला चरण उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे चुनावी राज्यों पर केंद्रित हो सकता है, जहां 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं।
दूसरी तरफ, भाजपा ने भी अपनी रणनीति तेज कर दी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी रुझानों का मुकाबला करने के लिए पार्टी के रणनीतिकारों ने आक्रामक अभियान की तैयारी की है। भाजपा समझती है कि विपक्ष के आरोपों का जवाब केवल प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं दिया जा सकता, बल्कि जमीन पर सक्रियता बढ़ानी होगी। इसी उद्देश्य से बड़ी रैलियों और सांगठनिक गतिविधियों पर जोर दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभाओं के साथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह संगठनात्मक सूक्ष्म प्रबंधन के जरिये पन्ना प्रमुखों को सक्रिय करने और बूथ स्तर पर चुनावी तैयारी मजबूत करने पर ध्यान दे सकते हैं।
भाजपा की एक प्रमुख रणनीति सांसदों और विधायकों की टास्क फोर्स तैयार करना है। त्योहारों के बाद उत्तर प्रदेश में बड़े नेताओं के दौरे तेज होने की संभावना है। प्रधानमंत्री की जनसभाओं और सांगठनिक बैठकों के माध्यम से कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने की कोशिश होगी। मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे हिंदी भाषी राज्यों के भाजपा सांसदों और विधायकों को भी उत्तर प्रदेश में जिम्मेदारियां सौंपी जा सकती हैं। ये नेता स्थानीय पदाधिकारियों के साथ घर-घर जनसंपर्क अभियान चलाकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देने और बूथ स्तर पर संगठन को सक्रिय करने का प्रयास करेंगे।
भाजपा जानती है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव केवल मोदी के नाम पर नहीं जीते जाते। जातीय और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसीलिए पार्टी लाभार्थी वर्ग, सामाजिक समूहों और जातीय समीकरणों पर भी ध्यान देगी। आंतरिक सर्वेक्षणों और राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर केंद्रीय नेतृत्व चुनावी रणनीति तैयार कर रहा है।
यह लड़ाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब राजनीतिक मुकाबला केवल दिल्ली या जिला मुख्यालयों तक सीमित नहीं है। कस्बे वह जगह हैं, जहां शहर और गांव दोनों की खबर पहुंचती है। चाय की दुकानों पर मोबाइल से वीडियो देखे जाते हैं और एक अफवाह पूरे जिले में फैल सकती है। इंडिया गठबंधन चाहता है कि मतदाता सूची का मुद्दा हर घर में चर्चा का विषय बने, जबकि भाजपा विकास और राष्ट्रवाद के मुद्दों को जनता तक पहुंचाना चाहती है।
विपक्ष ने इस लड़ाई को संस्था बनाम व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। उसका कहना है कि वह किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लड़ रहा है। भाजपा का पलटवार है कि विपक्ष प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को निशाना बनाकर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम कर रहा है। यह नैरेटिव की लड़ाई है, जिसमें जनता तक अपना पक्ष प्रभावी ढंग से पहुंचाना दोनों पक्षों के लिए जरूरी होगा।
भाजपा का टास्क फोर्स मॉडल नया नहीं है, लेकिन दूसरे हिंदी भाषी राज्यों के नेताओं को उत्तर प्रदेश में सक्रिय करना एक महत्वपूर्ण प्रयोग हो सकता है। इससे स्थानीय नेताओं को सहयोग मिलेगा, लेकिन बाहरी नेता यदि स्थानीय जातीय और सामाजिक समीकरणों को ठीक से नहीं समझ पाए, तो नुकसान भी हो सकता है।
मतदाता सूची से हटाए गए 13 करोड़ से अधिक नामों का आंकड़ा बड़ा है, लेकिन आम मतदाता के लिए उसका महत्व तभी स्पष्ट होगा, जब उसे अपने आसपास इसका प्रमाण दिखाई देगा। विपक्ष को यह मुद्दा जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से उठाना होगा, अन्यथा यह प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित रह सकता है। अंततः इस राजनीतिक मुकाबले का फैसला बूथ पर होगा। पर्दे के पीछे रणनीति चाहे जो बने, लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मतदाता का ही होता है। वही तय करेगा कि इंडिया गठबंधन के आरोपों का जवाब भाजपा की रैलियां दे पाती हैं या नहीं।














