संपादकीय
02 Mar, 2026

सत्ता के गलियारों से…

विधानसभा में सवाल-जवाब की परंपरा, जिम्मेदारी की राजनीति और सत्ता के गलियारों की खामोशी पर विश्लेषण। जानें कैसे सवाल का असर सदन से बाहर हल्का हो जाता है और शब्द अस्मिता का रूप ले लेते हैं।

1 = सवाल का वज़न बाहर ही हल्का हो गया क्या…
विधानसभा में सवाल लगाकर गायब हो जाने की पुरानी परंपरा इस बार भी निभाई गई। मलाईदार विभाग पर तीर चलाया गया, लेकिन जब जवाब सुनने का वक्त आया तो तीरंदाज़ ही मैदान से बाहर। नाम पुकारा गया, कुर्सी खाली। चर्चा यह नहीं कि जवाब क्या था, चर्चा यह कि सवाल का वज़न शायद सदन से बाहर कहीं हल्का कर लिया गया। बड़े खेल की बू इतनी तेज थी कि विपक्ष को बोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी—सदन की खामोशी ही कहानी कह रही थी।
2 = टोपी बदलो, मामला बदल जाएगा…
महाकौशल के माननीय का विभाग इन दिनों “इनोवेशन” में अव्वल है—घटिया निर्माण में नए मानक, भ्रष्टाचार में नई तकनीक। सदन में जब सवालों की बौछार हुई तो माननीय हर बार खड़े होकर यही कहते रहे—“ये हमारे विभाग का मामला नहीं।” विपक्ष मुस्कराया—“साहब, किसी का तो है।” लगता है विभाग बदलते ही जिम्मेदारी भी ट्रांसफर हो जाती है। टोपी इधर से उधर रख देने से सिर बदलता नहीं, लेकिन सदन में कोशिश जारी है।
3 = जनसेवा का फल इतना जल्दी पक गया…
दो साल पहले तक साधारण जीवन, आज असाधारण उन्नति। राजनीति में यह चमत्कार तेजी से होता है। शिक्षा के क्षेत्र से निकले माननीय के परिवार में हाल ही में एक प्रतिष्ठान का शुभारंभ हुआ। जिले और राज्य के बड़े चेहरे मौजूद थे। पंडाल में बैठे लोग सोच रहे थे—जनसेवा का फल इतना जल्दी पक जाता है क्या? जनता अब भी वही है, पर संपत्ति की ग्राफ ने जैसे रॉकेट पकड़ लिया हो।
4 = गद्दार कौन, मंच पर सन्नाटा कौन…
बुंदेलखंड के मंच से आवाज आई—“हम गद्दार नहीं हैं।” मंच पर बैठे लोग एक-दूसरे को देखने लगे। हवा में सवाल तैरता रहा—इशारा किस ओर है? पुराने बनाम नए, अंदर बनाम बाहर… राजनीति में निष्ठा की परिभाषा वक्त के साथ बदलती है, पर बयान की धार कभी-कभी अपनों को भी चुभ जाती है।
5 = औकात की बहस और अस्मिता की राजनीति…
सदन में असंसदीय भाषा का मामला ठंडा पड़ता दिखा, लेकिन विपक्ष ने राख कुरेद दी। अब यह केवल शब्दों का विवाद नहीं, अस्मिता का सवाल बन रहा है। ट्राइबल क्षेत्र में मुद्दा पहुंचाने की तैयारी है। राजनीति में शब्द कभी मरते नहीं, सही मंच मिलते ही फिर जिंदा हो जाते हैं।
6 = कहना भी मुश्किल, सहना भी मुश्किल…
सत्ता के नंबर दो माने जाने वाले माननीय सदन में शांत बैठे रहे। विभाग पर सवालों की बरसात होती रही। चेहरे पर संयम, आंखों में असहजता। बोलते तो मुश्किल, चुप रहते तो और मुश्किल। राजनीति में कई बार सबसे ऊंची आवाज वही होती है जो नहीं बोली जाती।
सत्ता के गलियारों में इन दिनों खामोशी भी बोल रही है—और बोलने वाले भी खामोश हैं।
 
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