मध्य प्रदेश में आयोजित युवा विधायक सम्मेलन ने युवाओं को विधायी प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी और नीति-आधारित राजनीति की दिशा में मार्गदर्शन देने का अवसर प्रदान किया है।
-राजेन्द्र कानूनगो
मध्य प्रदेश में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के युवा विधायकों का सम्मेलन मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर द्वारा आयोजित किया गया है। इसमें भारतीय लोकतंत्र की नई ऊर्जा और संभावनाओं का विश्लेषण होगा।
भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, जहाँ की 65 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि देश की नीति-निर्धारण प्रक्रियाओं और विधायी निकायों में युवाओं की भागीदारी केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। हाल में आयोजित होने वाले 'युवा विधायक सम्मेलन' ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विमर्श को जन्म दिया है। यह प्रश्न अत्यंत सामयिक है कि क्या ये सम्मेलन केवल औपचारिक मेल-मिलाप के मंच हैं या वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की दिशा बदलने वाले सार्थक कदम?
युवा विधायकों के सम्मेलन की वैचारिक पृष्ठभूमि
लोकतंत्र में 'प्रतिनिधित्व' का अर्थ केवल मतदान करना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की आकांक्षाओं का सदन में प्रतिबिंबित होना है। युवा विधायक सम्मेलन एक ऐसा मंच प्रदान करता है, जहाँ विभिन्न विचारधाराओं, क्षेत्रों और भाषाई पृष्ठभूमि के युवा जनप्रतिनिधि एक साथ आते हैं।
इस प्रकार के सम्मेलनों का मूल उद्देश्य युवा नेतृत्व को विधायी प्रक्रियाओं की बारीकियों से अवगत कराना, उनके भीतर 'पार्टी लाइन' से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में सोचने की क्षमता विकसित करना और आधुनिक समस्याओं, जैसे एआई, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल इकोनॉमी पर तकनीकी समझ बढ़ाना है।
क्यों महत्वपूर्ण हैं ये सम्मेलन?
अनुभव और ऊर्जा का समन्वय -
सदन में अक्सर वरिष्ठ नेताओं का दबदबा रहता है, जहाँ परंपराएं और पुराने अनुभव हावी होते हैं। युवा विधायक सम्मेलन इन युवाओं को आत्मविश्वास प्रदान करते हैं कि वे अपनी नई सोच और तकनीक-आधारित समाधानों को निडरता से रख सकें। जब एक युवा विधायक दूसरे राज्य के साथी से मिलता है, तो उसे 'बेस्ट प्रैक्टिसेज' यानी सर्वोत्तम प्रथाओं को सीखने का अवसर मिलता है।
वैचारिक संकीर्णता से मुक्ति -
आज की राजनीति अक्सर दलीय ध्रुवीकरण का शिकार है। युवा सम्मेलनों में जब अलग-अलग दलों के विधायक एक मेज पर बैठते हैं, तो उनके बीच एक 'अनौपचारिक संवाद' विकसित होता है। यह संवाद भविष्य में स्वस्थ विधायी बहस और सदन की गरिमा बनाए रखने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
भविष्य की चुनौतियों पर केंद्रित चर्चा -
पुराने दौर की राजनीति जहाँ बिजली, सड़क और पानी तक सीमित थी, वहीं आज की चुनौतियां बदल चुकी हैं। युवा विधायक साइबर सुरक्षा, स्टार्टअप इकोसिस्टम, और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर अधिक संवेदनशील होते हैं। सम्मेलनों के माध्यम से इन विषयों पर विधायी कार्यसूची तैयार करना आसान हो जाता है।
मध्य प्रदेश और क्षेत्रीय राजनीति के संदर्भ में प्रासंगिकता -
यदि हम मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के परिप्रेक्ष्य में देखें, जहाँ की राजनीति में क्षेत्रीय संतुलन और ग्रामीण-शहरी विभाजन स्पष्ट है, वहां युवा विधायकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। मालवा से लेकर बुंदेलखंड तक के युवा जनप्रतिनिधि जब इन सम्मेलनों में अपनी बात रखते हैं, तो वे अपनी मिट्टी की समस्याओं को आधुनिक शब्दावली में पिरोकर नीति-निर्माताओं के सामने रखते हैं।प्रशासनिक सुधारों और तकनीक के उपयोग में युवा विधायकों की रुचि ने शासन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया है। उदाहरण के तौर पर, लोक सेवा गारंटी कानून या कृषि कल्याण योजनाओं के डिजिटल कार्यान्वयन में युवा नेतृत्व ने एक सेतु का कार्य किया है।
सम्मेलन की सार्थकता पर उठते सवाल -
चुनौतियां और सीमाएं
किसी भी आयोजन की सार्थकता उसके 'आउटपुट' से मापी जाती है। युवा विधायक सम्मेलनों के समक्ष कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं, जैसे -
टोकनवाद :
कई बार ये सम्मेलन केवल फोटो-अप और इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित रह जाते हैं। यदि सम्मेलनों में पारित संकल्पों पर विधानसभाओं में चर्चा नहीं होती, तो इनकी सार्थकता कम हो जाती है।
पार्टी हाईकमान का नियंत्रण-
भारतीय राजनीति में 'व्हिप' और दलीय अनुशासन इतना सख्त है कि युवा विधायक चाहकर भी अपनी स्वतंत्र राय सदन के पटल पर नहीं रख पाते। सम्मेलन की सीख अक्सर पार्टी की विचारधारा के आगे गौण हो जाती है।
निरंतरता का अभाव-
ये आयोजन वार्षिक होना चाहिए। सम्मेलनों के बीच में संवाद की कोई स्थायी व्यवस्था न होना भी एक बड़ी कमी है, इसे दूर किया जाना चाहिए।
संसदीय गरिमा और युवा नेतृत्व -
हाल के वर्षों में संसद और विधानसभाओं में हंगामे और अमर्यादित आचरण की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे समय में युवा विधायकों का सम्मेलन एक *'संस्कार केंद्र'* के रूप में कार्य कर सकता है। यदि युवा पीढ़ी यह संकल्प ले कि वे सदन को 'व्यवधान' के बजाय 'विमर्श' का केंद्र बनाएंगे, तो यह बात इन सम्मेलनों की सबसे बड़ी सफलता होगी।
संसदीय शब्दावली, प्रश्नकाल का सदुपयोग और शून्यकाल में लोक महत्व के विषय उठाने की कला सीखना किसी भी नव-निर्वाचित विधायक के लिए अनिवार्य है। ऐसे सम्मेलन इन बारीकियों को सीखने का एक सघन प्रशिक्षण केंद्र साबित होते हैं।
भविष्य की राह-
युवा विधायक सम्मेलनों को महज एक आयोजन से बदलकर एक 'थिंक-टैंक' के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं, जैसे कि
विषय-आधारित कार्यशालाएं।
केवल सामान्य चर्चा के बजाय कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा और तकनीक जैसे विशिष्ट विषयों पर 'वर्किंग ग्रुप' बनाए जाने चाहिए।
डिजिटल नेटवर्किंग:
सम्मेलनों के बाद भी सभी युवा विधायकों के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म होना चाहिए जहाँ वे अपने क्षेत्र में किए गए सफल प्रयोगों को साझा कर सकें।
मेंटरशिप प्रोग्राम:
पूर्व अनुभवी सांसदों और विधायकों को इन सम्मेलनों में मार्गदर्शक के रूप में जोड़ना चाहिए ताकि ऊर्जा को अनुभव का साथ मिल सके।
रिपोर्ट कार्ड:
प्रत्येक सम्मेलन के बाद एक 'श्वेत पत्र' जारी होना चाहिए कि चर्चा के कौन से बिंदु विधायी प्रक्रियाओं का हिस्सा बने।
कुल मिलाकर यह कहना समीचीन होगा कि युवा विधायकों का सम्मेलन केवल युवा चेहरों का जमावड़ा नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के कायाकल्प की एक सुबुगाहट है। इसकी सार्थकता इस बात में निहित है कि यहाँ से निकला हुआ विधायक जब अपने क्षेत्र में जाए, तो वह केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक 'समस्या समाधानकर्ता' के रूप में कार्य करे।
यदि ये सम्मेलन युवाओं को लोक-लुभावन राजनीति के बजाय नीति-आधारित राजनीति की ओर प्रेरित करते हैं, तो निश्चित ही यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक शुभ संकेत है।
बदलती दुनिया और तकनीक के इस दौर में, युवा विधायकों की सक्रियता और उनकी सुशिक्षित सोच ही भारत को एक 'सशक्त और आधुनिक गणतंत्र' बनाने की दिशा में सबसे सार्थक कदम सिद्ध होगी।
युवा सांसदों के लिए भी कुछ इसी प्रकार के सम्मेलन आयोजित होने चाहिए।
अतः इन सम्मेलनों का भविष्य उज्ज्वल है, बशर्ते इन्हें राजनीतिक चश्मे से दूर रखकर राष्ट्र निर्माण की कार्यशाला के रूप में देखा जाए।