नई दिल्ली, 26 मार्च।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण हवाई यात्रा प्रभावित होने की संभावना बढ़ गई है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनातनी के चलते जेट फ्यूल यानी एयर टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) की कीमत में पिछले एक महीने में वैश्विक स्तर पर 100 प्रतिशत से अधिक की तेजी आ गई है। इस स्थिति में विमानन कंपनियों के सामने हवाई किराए बढ़ाने की मजबूरी पैदा हो गई है।
जेट फ्यूल के दाम बढ़ने से दबाव झेल रही एयरलाइंस ने केंद्र सरकार से एयरपोर्ट चार्ज में कटौती की मांग की है। कंपनियों का कहना है कि यदि चार्ज कम नहीं किया गया, तो हवाई किराए में उन्हें लगभग दोगुनी वृद्धि करनी पड़ सकती है।
फरवरी के बाद से जेट फ्यूल की कीमत में जबरदस्त उछाल देखा गया है। 20 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में जेट फ्यूल 95.90 डॉलर प्रति बैरल बिक रहा था, जो अब 197 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। इस प्रकार सिर्फ एक महीने में कीमत दोगुनी से अधिक हो गई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में आई तेजी का असर भारतीय बाजार में भी स्पष्ट दिख रहा है। सूत्रों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय दरों के अनुरूप सामंजस्य बनाए रखने और नुकसान से बचने के लिए भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (ओएमसी) अप्रैल में एटीएफ की कीमत में एक बार फिर वृद्धि कर सकती हैं। इससे पहले से बढ़ी ऑपरेटिंग लागत और अधिक बढ़ जाएगी और इसका असर हवाई टिकट के दाम पर भी पड़ेगा।
विमानन कंपनियों ने केंद्र से हवाई अड्डों पर लैंडिंग और पार्किंग चार्ज में कटौती के साथ टैक्स राहत की भी मांग की है, ताकि जेट फ्यूल के महंगे होने से बढ़ी लागत को कुछ हद तक संतुलित किया जा सके। हालांकि, अधिकांश प्रमुख हवाई अड्डों का निजी संचालन होने के कारण चार्ज में कटौती की संभावना कम मानी जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी एयरलाइन की कुल ऑपरेटिंग लागत में जेट फ्यूल लगभग 40 प्रतिशत का योगदान करता है। फ्यूल की कीमत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ता है। पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को लंबा रूट अपनाना पड़ रहा है, जिससे जेट फ्यूल की खपत बढ़ रही है और संचालन खर्च बढ़ रहा है।
ऐसी स्थिति में यदि एयरपोर्ट चार्ज और टैक्स में राहत नहीं दी गई, तो विमानन कंपनियों के लिए हवाई किराए में बढ़ोतरी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।












