21, मार्च
भारतीय लोककथाओं और परंपराओं में मोर को वर्षा का दूत माना जाता है, और यह विश्वास सदियों से लोगों के बीच जीवित है कि जब मोर नृत्य करता है या उसकी आँखों में नमी दिखाई देती है, तो वह बारिश आने का संकेत देता है। गाँवों में अक्सर यह कहा जाता है कि मोर “रोकर” बादलों को बुलाता है और उसके आँसू वर्षा का कारण बनते हैं, जबकि उसकी तेज आवाज़ और नृत्य को प्रकृति के साथ संवाद के रूप में देखा जाता है। भारतीय कला, संगीत और साहित्य में भी मोर को प्रेम, विरह और मानसून के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जहाँ उसका नृत्य वर्षा के स्वागत और प्रकृति के उत्सव का संकेत माना जाता है। कई लोग यह भी मानते हैं कि जब बादलों की गर्जना होती है, तो मोर की पुकार और तेज हो जाती है, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है कि वह वर्षा को बुला रहा है। यह विश्वास इसलिए भी गहराई से जुड़ा है क्योंकि मानसून के समय मोर अधिक दिखाई देते हैं और उनका नृत्य लोगों के लिए एक अद्भुत दृश्य बन जाता है, जिससे यह कल्पना और भी आकर्षक और भावनात्मक बन जाती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से मोर के आँसुओं और वर्षा के बीच कोई संबंध नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह एक प्राकृतिक और जैविक प्रक्रिया है। वास्तव में मोर का नृत्य वर्षा लाने के लिए नहीं, बल्कि अपने साथी को आकर्षित करने के लिए होता है, क्योंकि उनका प्रजनन काल मई से शुरू होकर मानसून के साथ मेल खाता है। इस दौरान नर मोर अपने बड़े और रंगीन पंख फैलाकर नृत्य करता है ताकि मादा को आकर्षित कर सके, और यह व्यवहार प्राकृतिक चयन का हिस्सा है। साथ ही, मानसून से पहले वातावरण में आर्द्रता (ह्यूमिडिटी), वायुदाब (एयर प्रेशर) और तापमान में बदलाव होते हैं, जिन्हें पक्षी मनुष्यों की तुलना में जल्दी महसूस कर लेते हैं, इसलिए वे अधिक सक्रिय हो जाते हैं और नृत्य या आवाज़ के माध्यम से प्रतिक्रिया देते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि कई जानवर और पक्षी मौसम के इन सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील होते हैं और उनका व्यवहार वर्षा का संकेत दे सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे वर्षा को नियंत्रित करते हैं। जहाँ तक “आँसू” का सवाल है, मोर मनुष्यों की तरह भावनात्मक आँसू नहीं बहाते, उनकी आँखों की नमी केवल सामान्य जैविक कार्य का हिस्सा होती है। इस प्रकार, मोर का नृत्य और उसकी सक्रियता वर्षा से जुड़ी हुई तो है, लेकिन कारण के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकेतों के प्रति एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में।












