नई दिल्ली, 19 अप्रैल।
एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था वर्तमान में वैश्विक तेल संकट और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनावों के प्रभाव को झेलने में सक्षम स्थिति में है तथा वित्त वर्ष 2027 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.8 से 7.1 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत इस समय वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भी मजबूत मैक्रोइकॉनॉमिक आधार के सहारे बेहतर स्थिति में प्रवेश कर चुका है। इसमें उल्लेख किया गया कि वित्त वर्ष 2026 में 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ देश ने पहले से ही अपनी आर्थिक मजबूती का प्रदर्शन किया है और वैश्विक संकटों के बीच भी इसी प्रकार की मजबूती बनी हुई है।
हालांकि वित्त वर्ष 2027 में वृद्धि दर में कुछ नरमी आने की संभावना जताई गई है, लेकिन रिपोर्ट में सुपर एल नीनो जैसी मौसम संबंधी परिस्थितियों को संभावित जोखिम के रूप में चिन्हित किया गया है, जो आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। मुद्रास्फीति के लगभग 4.5 प्रतिशत रहने और राजकोषीय घाटा 4.5 से 4.6 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
वित्तीय प्रणाली की मजबूती का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि देश का बैंकिंग क्षेत्र स्थिर स्थिति में बना हुआ है। साथ ही भुगतान संतुलन और रुपये की स्थिरता के लिए व्यापक नीतिगत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कृषि, सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्योग, उपभोग और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही भारत के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत करने के अवसर भी उभर रहे हैं।
इसमें यह भी कहा गया कि दुबई और अबू धाबी जैसे वित्तीय केंद्रों में अनिश्चितता के चलते भारत के गिफ्ट सिटी को एक स्थिर वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में उभरने का अवसर मिल सकता है।
मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों में हवाई क्षेत्र बाधित होने से भारतीय हवाई अड्डों को वैकल्पिक पारगमन केंद्र बनने का अवसर मिल सकता है, बशर्ते बुनियादी ढांचे और यात्री सेवाओं में निवेश किया जाए।
मौद्रिक नीति पर रिपोर्ट में कहा गया है कि कई वैश्विक केंद्रीय बैंक दरों में बदलाव रोक चुके हैं और भारत में भी निकट भविष्य में मौजूदा स्थिति बनाए रखने की संभावना है। इसमें यह भी कहा गया कि विकास और मुद्रास्फीति के संतुलन के चलते फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव की गुंजाइश सीमित है और वैश्विक परिस्थितियों के स्पष्ट होने तक कम दरों की नीति जारी रह सकती है।









.jpg)