भोपाल, 05 नवंबर।
जब सफाई करने वाले हाथ रुक गए, तो शहर की सांसें भी थमने लगीं। झीलों और हरियाली के लिए पहचाने जाने वाले भोपाल की सड़कों, मैदानों और गलियों में कचरे के ढेर लग गए हैं। इसकी वजह है सफाई कर्मचारियों की हड़ताल। सुबह चार बजे उठकर शहर को स्वच्छ रखने वाले कर्मचारी आज अपनी मांगों को लेकर काम बंद करने पर मजबूर हैं। यह केवल हड़ताल नहीं, बल्कि शहर की व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
सफाई कर्मचारियों की मांगें लंबे समय से चली आ रही अनदेखी का परिणाम हैं। वे समय पर वेतन, स्थायी नौकरी, सुरक्षा उपकरण, स्वास्थ्य बीमा और अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं। वर्षों से ठेके पर काम करने वाले इन कर्मचारियों को दस्ताने, जूते और मास्क जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। उनकी समस्याओं का समय रहते समाधान किया जाता, तो शायद आज यह स्थिति नहीं बनती।
सड़कों पर जमा कचरा केवल बदबू नहीं फैलाता, बल्कि बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता है। इसमें मच्छर और मक्खियां पनपते हैं, जिससे डेंगू, मलेरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। कचरा नालों के माध्यम से झीलों तक पहुंचा, तो पर्यावरण के लिए भी गंभीर संकट पैदा हो सकता है। यह स्थिति स्वच्छता के दावों पर सवाल खड़े करती है।
नगर निगम प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह तत्काल सफाई की वैकल्पिक व्यवस्था करे और कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत कर उनकी समस्याओं का सम्मानजनक समाधान निकाले। मांगों पर समयबद्ध निर्णय लेने के साथ वेतन, सुरक्षा और सेवा शर्तों में सुधार जरूरी है। दीर्घकालीन समाधान के लिए कचरा प्रबंधन को आधुनिक बनाने और गीले-सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र करने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे कचरा खुले में न फेंकें और सफाई कर्मचारियों का सम्मान करें। भोपाल की यह हड़ताल चेतावनी है कि शहर को स्वच्छ रखने वालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। कचरे के ढेर हटाना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है मन में बैठा भेदभाव हटाना। शहर तभी स्वच्छ रहेगा, जब सफाई करने वाले हाथों को सुरक्षा, सम्मान और स्थायित्व मिलेगा।













