गेलेफू, 04 नवंबर।
भूटान के गेलेफू शहर में रविवार को जो दृश्य दिखाई दिया, वह केवल निर्माण नहीं, बल्कि आस्था और सामूहिक समर्पण का जीवंत प्रमाण था। करीब 40 हजार स्वयंसेवकों ने महज 12 घंटे में 108 विशाल बौद्ध स्तूपों का निर्माण पूरा किया। रात दो बजे शुरू हुआ यह कार्य दोपहर दो बजे तक पूरा हो गया। दुनिया भर से आए करीब दो लाख लोग इस अवसर के साक्षी बने। यह आयोजन बताता है कि जब मन में श्रद्धा और हाथों में एकता हो, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।
बौद्ध धर्म में 108 अंक को अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह आध्यात्मिक साधना, ज्ञान और शुद्धता का प्रतीक है। प्रत्येक स्तूप करीब 50 फीट ऊंचा है और इन्हें माओ छू नदी के किनारे कतार में बनाया गया है। प्रोजेक्ट 108 के तहत निर्मित ये स्तूप केवल धार्मिक संरचनाएं नहीं, बल्कि प्रकृति और अध्यात्म के संगम के प्रतीक हैं। आने वाले समय में ये ध्यान और शांति के केंद्र बन सकते हैं।
इस समारोह का सबसे भावुक क्षण तब आया, जब भूटान के राजा ने स्तूप संख्या 76 भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को समर्पित किया। यह समर्पण भारत और भूटान के बीच गहरी मित्रता, विश्वास और साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक है। समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे केंद्रीय मंत्री ने भी इस आयोजन को विशेष अनुभव बताया। भूटान के राजा, प्रधानमंत्री दाशो शेरिंग तोबगे और वहां की जनता की उपस्थिति में प्रार्थना की गई। यह आयोजन दोनों देशों के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊंचाई देता है।
करीब 40 हजार स्वयंसेवकों का एक साथ काम करना सामूहिक प्रयास की असाधारण मिसाल है। इसकी तैयारी कई महीनों से चल रही थी। कोई निर्माण सामग्री जुटा रहा था, कोई मिट्टी तैयार कर रहा था, तो कोई प्रार्थना और मंत्रोच्चार में जुटा था। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि ने वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। यह दृश्य बताता है कि विकास केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नागरिकों के सामूहिक संकल्प से भी संभव होता है।
गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी इसी सोच का विस्तार है। भूटान का प्रयास है कि भविष्य का विकास केवल कंक्रीट की इमारतों तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें मानसिक शांति, प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना को भी स्थान मिले। आज जब दुनिया के बड़े शहर प्रदूषण और तनाव से जूझ रहे हैं, तब यह विचार महत्वपूर्ण हो जाता है कि वास्तविक विकास वही है, जो जीवन को बेहतर बनाए।
भारत के लिए भी इसमें सीख है। हमारे यहां अनेक बौद्ध और हिंदू तीर्थस्थल हैं, लेकिन कई जगह व्यवस्थाओं और संरक्षण में सुधार की जरूरत है। यदि स्थानीय समुदाय, युवा और स्वयंसेवी संगठन मिलकर श्रमदान करें, तो इन स्थलों का कायाकल्प किया जा सकता है। धार्मिक स्थलों को केवल पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि साधना, शांति और सांस्कृतिक चेतना के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए।
बारह घंटे में 108 स्तूपों का निर्माण केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक संकल्प और समर्पण की शक्ति का संदेश है। स्तूप संख्या 76 का भारत को समर्पण इस आयोजन को दोनों देशों की मित्रता से भी जोड़ता है। भूटान ने यह संदेश दिया है कि आस्था जब कर्म बनती है, तो वह केवल स्मारक नहीं बनाती, बल्कि पीढ़ियों तक प्रेरणा देने वाली विरासत भी रचती है।














