अशोकनगर, 04 नवंबर।
अशोकनगर जिले में बेतवा नदी के मल्हारगढ़ घाट पर हुई घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी है। रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि दिनदहाड़े नदी का सीना छलनी किया जा रहा है और जिम्मेदार विभाग मूकदर्शक बने हैं। नगरपालिका अध्यक्ष और पूर्व सांसद केपी यादव जब मुंगावली जा रहे थे, तभी ओवरलोड रेत से भरे डंपर ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी। संदीप धाम पर गाड़ी रुकवाकर पूछताछ की गई तो चालकों ने अवैध रेत परिवहन की बात स्वीकार की। इसके बाद यादव मल्हारगढ़ घाट पहुंचे, जहां नदी के बीच पांच पनडुब्बी मशीनों से बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन हो रहा था। उन्होंने कलेक्टर, एसपी और खनिज विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी, लेकिन उनके आरोप के मुताबिक, घटनास्थल से महज 30 मिनट की दूरी पर मौजूद प्रशासनिक अमला चार घंटे तक नहीं पहुंचा। यह लाचारी है या माफिया के साथ मिलीभगत?
मामले में सबसे गंभीर सवाल कार्रवाई को लेकर है। मौके पर अवैध उत्खनन में प्रयुक्त मशीनें और डंपर जब्त हुए, मजदूर भी पकड़े गए, फिर भी मामला अज्ञात आरोपितों के खिलाफ दर्ज किया गया। जब मशीनें और वाहन मौके पर मिले, तो उनके मालिकों की पहचान करना इतना मुश्किल क्यों है? मजदूर किसके लिए काम कर रहे थे और उत्खनन का संचालन कौन कर रहा था, इसकी जांच क्यों नहीं हुई? खनिज विभाग का यह तर्क कि यहां नया रास्ता बना था, जिम्मेदारी से बचने का प्रयास लगता है। नदी के बीच पांच मशीनों से उत्खनन बिना किसी तैयारी और संसाधन के संभव नहीं है। इतने बड़े स्तर पर अवैध कारोबार चलने के बावजूद अधिकारियों को इसकी भनक नहीं लगना अपने आप में गंभीर सवाल है।
खनिज विभाग की जिम्मेदारी अवैध उत्खनन रोकना है, लेकिन यहां उसकी निगरानी पर ही सवाल उठ रहे हैं। यदि यह गतिविधि प्रशासन की जानकारी के बिना चल रही थी, तो नियमित निरीक्षण का क्या औचित्य है? यदि जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? शहर से रोजाना गुजरने वाले सौ से अधिक डंपरों पर जिम्मेदार विभागों की नजर क्यों नहीं पड़ी? यदि घाट तक पहुंचने के लिए नया रास्ता बनाया गया था, तो सूचना मिलने के बाद उसे तत्काल बंद क्यों नहीं किया गया? इन सवालों के जवाब प्रशासन को देने होंगे।
पूर्व सांसद को चार घंटे इंतजार करना पड़ा, तो आम नागरिक की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। पुलिस गश्त और प्रशासनिक निगरानी की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जब अवैध उत्खनन खुलेआम हो रहा हो, तब पुलिस और खनिज विभाग की सक्रियता कहां गायब हो जाती है? क्या जिम्मेदार अधिकारी अपने कर्तव्य निभाने में असफल रहे या किसी दबाव में कार्रवाई से बचते रहे?
अब केवल अज्ञात आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए। जब्त मशीनों और डंपरों के मालिकों की पहचान कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। खनिज विभाग की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो और मौके पर पहुंचने में देरी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। यह केवल रेत चोरी नहीं, बल्कि पर्यावरण और सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने का मामला है। यदि प्रशासन ने अब भी कठोर कदम नहीं उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब बेतवा का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।














