नई दिल्ली, 04 नवंबर।
लूट का नया नाम अब साइबर अपराध नहीं, डिजिटल डकैती कहिए। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में जो टिप्पणी की, वह केवल अदालती टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक नई परिभाषा है। कोर्ट ने साइबर अपराध को डिजिटल डकैती कहने की बात कही। यह शब्द बहुत सोच-समझकर चुना गया है। पहले हम कहते थे कि ऑनलाइन ठगी हो गई या धोखाधड़ी हो गई, लेकिन ठगी शब्द में एक हल्कापन है। डकैती शब्द में डर और हिंसा का भाव है, और यही आज की सच्चाई है। अपराधी अब घर का ताला तोड़कर नहीं आता, बल्कि फोन पर वीडियो कॉल में पुलिस की वर्दी पहनकर सामने आता है और व्यक्ति को उसके ही घर में नजरबंद कर देता है। इसलिए इसे डकैती कहना ज्यादा सटीक है, क्योंकि इसमें हथियार की जगह मनोवैज्ञानिक दबाव का इस्तेमाल होता है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डर का कारोबार चल रहा है। डिजिटल अरेस्ट नाम का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन इसका खौफ अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार बन गया है। एक बुजुर्ग व्यक्ति घर में अकेला बैठा है। फोन आता है कि उसका आधार कार्ड मादक पदार्थों की तस्करी में पकड़ा गया है या उसके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग हुई है। फिर खुद को सीबीआई या नारकोटिक्स अधिकारी बताने वाला व्यक्ति वर्दी में वीडियो कॉल करता है और कहता है कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। वह बाहर नहीं जा सकता और उसका बैंक खाता सीज होने वाला है। बदनामी के डर से व्यक्ति टूट जाता है और अपनी जीवनभर की कमाई अनजान खाते में भेज देता है। यह लूट है, लेकिन इसमें चाकू नहीं दिखता।
इस अपराध का दूसरा पहलू म्यूल खाते हैं। कई युवा सोचते हैं कि किसी के कहने पर अपने खाते में पैसा मंगवाने और दस प्रतिशत कमीशन लेने में क्या बुराई है। यही सोच उन्हें अपराध के जाल में फंसा देती है। ठगी का पैसा पहले ऐसे खातों में आता है और फिर कई खातों में बांट दिया जाता है। पुलिस जांच करती है तो सबसे पहले खाताधारक तक पहुंचती है। अनजान होने का बहाना उसे जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर देता। अपना बैंक खाता इस तरह इस्तेमाल होने देना संगठित अपराध का हिस्सा बन सकता है।
इस मामले में 12 राज्यों में 30 से अधिक शिकायतें हैं। आरोपितों ने सभी मामलों की सुनवाई एक जगह करने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया। अलग-अलग राज्यों में जांच जारी रहने से पूरे नेटवर्क की परतें खुल सकती हैं। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसने खाता उपलब्ध कराया, किसने फोन किया और किसने पैसा निकाला। यह पीड़ितों के हितों को प्राथमिकता देने वाली न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण पहलू है।
बुजुर्ग साइबर अपराधियों के आसान निशाने बनते हैं, क्योंकि वे अक्सर अकेले रहते हैं और पुलिस के नाम से घबरा जाते हैं। यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि भावनात्मक अपराध भी है, जो लोगों का भरोसा तोड़ता है। इसलिए परिवारों को बुजुर्गों को जागरूक करना होगा। उन्हें समझाना होगा कि कोई भी असली पुलिस अधिकारी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का भय दिखाकर पैसे नहीं मांगता। अपना बैंक खाता किराये पर देना भी गंभीर मुसीबत में डाल सकता है।
डिजिटल इंडिया का अर्थ केवल इंटरनेट पहुंचाना नहीं, बल्कि डिजिटल विवेक विकसित करना भी है। बैंकों को संदिग्ध लेनदेन की पहचान के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल करना चाहिए। दूरसंचार कंपनियों को फर्जी सिम और स्पूफ कॉल रोकने के प्रयास तेज करने चाहिए। हर थाने में साइबर सहायता व्यवस्था होनी चाहिए, जहां लोग बिना डरे अपनी शिकायत बता सकें।
डिजिटल डकैती का सबसे बड़ा हथियार डर है और इसका सबसे बड़ा इलाज जागरूकता। जब भी किसी अनजान कॉल पर गिरफ्तारी या पैसे को लेकर धमकी मिले, तो घबराने के बजाय रुककर सोचें, फोन काटें और परिवार से बात करें। याद रखिए, डिजिटल दुनिया में अपराधी आपके डर का फायदा उठाता है। डर पर नियंत्रण और जागरूकता ही इस डकैती से बचाव का सबसे प्रभावी रास्ता है।















