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संपादकीय
04 Nov, 2026

पत्रकारिता की रीढ़ है भरोसा: स्रोत बचा तो लोकतंत्र बचा

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून को लेकर स्रोतों की गोपनीयता और खोजी पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर उठे सवालों के बीच निजता व जनहित का संतुलन जरूरी है।

नई दिल्ली, 04 नवंबर।

हर बड़ी खबर के पीछे एक चेहरा होता है, जो कभी सामने नहीं आता। वह सरकारी फाइल से एक पन्ना निकालकर देता है, कंपनी के अंदर की गड़बड़ी की जानकारी देता है या अस्पताल के घोटाले का सच बताता है। वह जानता है कि सच बताने पर उसकी नौकरी जा सकती है और उसका परिवार खतरे में पड़ सकता है। इसलिए वह पत्रकार से एक ही वादा मांगता है कि उसका नाम कभी उजागर न हो। यही वादा पत्रकारिता की बुनियाद है। यदि यह वादा टूट गया, तो खबरों के स्रोत सूख जाएंगे और खोजी पत्रकारिता केवल प्रेस विज्ञप्तियों की नकल बनकर रह जाएगी।

मीडियाकर्मी का नैतिक दायित्व है कि वह खोजपूर्ण खबर में सहयोग करने वाले स्रोत की सुरक्षा और उसके विश्वास को कायम रखे। गोपनीय स्रोत की पहचान सुरक्षित रखने का वादा महज पेशेवर शिष्टाचार नहीं, बल्कि खोजी पत्रकारिता की बुनियाद है। यदि जनहित में महत्वपूर्ण गोपनीय सूचनाएं देने वालों का भरोसा टूटेगा, तो भ्रष्टाचार और जनविरोधी गतिविधियों का खुलासा करने वाले लोग आगे आने से कतराएंगे। व्हिसलब्लोअर गंभीर अनियमितताओं पर चुप्पी साध सकते हैं। इससे जनता जरूरी जानकारी से वंचित रह जाएगी।

इस विषय की गंभीरता के चलते ही देश के सर्वोच्च न्यायालय में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी) को चुनौती दी गई है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन ने आशंका जताई है कि इस कानून के प्रावधान पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर कर सकते हैं, जिससे स्वतंत्र समाचार संकलन और खोजी पत्रकारिता प्रभावित हो सकती है। चिंता यह भी है कि सरकार को नागरिकों की निजी जानकारी एकत्र करने वाली संस्थाओं से सूचना प्राप्त करने के अधिकार मिलने से स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा बढ़ सकता है। इस मामले में याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को निर्धारित की गई है।

इसमें दो राय नहीं कि तेजी से डिजिटल होती दुनिया में निजता की सुरक्षा बेहद जरूरी है। नागरिकों की निजी जानकारी का दुरुपयोग रोकना आवश्यक है, लेकिन निजता की रक्षा के लिए बनाया गया कानून सत्ताधीशों के लिए तथ्यों की खोज और जांच-पड़ताल में बाधा बनने का माध्यम नहीं होना चाहिए। शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और कॉरपोरेट जगत की गड़बड़ियों का खुलासा अक्सर ऐसे लोग करते हैं, जो जोखिम उठाकर वास्तविक तथ्य सामने लाते हैं। पर्याप्त सुरक्षा के बिना उनकी पहचान उजागर होने से पत्रकारिता की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

सोचिए, यदि यह संदेश फैल गया कि कानून के जरिये पत्रकारों के स्रोतों की पहचान उजागर की जा सकती है, तो क्या होगा? घोटाले का पता लगाने वाला सरकारी कर्मचारी चुप हो जाएगा, नकली दवाओं का सच जानने वाला डॉक्टर खामोश रह जाएगा और पुल निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल देखने वाला इंजीनियर सामने आने से बचेगा। ऐसी चुप्पी भ्रष्टाचार को ताकत देगी। यह केवल पत्रकारों का नुकसान नहीं, बल्कि हर नागरिक के जानने के अधिकार का नुकसान है।

डिजिटल युग में स्रोतों की सुरक्षा और कठिन हो गई है। पहले सूचना देने वाला दस्तावेज लेकर आता था, आज वह पेन ड्राइव या ईमेल से जानकारी भेजता है। डिजिटल गतिविधियों के मेटाडेटा से यह पता लगाया जा सकता है कि किसने किससे संपर्क किया और किसने किसे फाइल भेजी। यदि टेलीकॉम या इंटरनेट कंपनियों से डेटा प्राप्त करने के अधिकारों पर पर्याप्त न्यायिक निगरानी नहीं होगी, तो स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा बढ़ सकता है।

दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में पत्रकारों के स्रोतों की सुरक्षा को कानूनी मान्यता मिली है। अमेरिका के कई राज्यों में शील्ड कानून पत्रकारों को स्रोत बताने से संरक्षण देते हैं। यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने भी प्रेस की स्वतंत्रता के लिए स्रोतों की सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया है। भारत में भी प्रेस की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए देश को ऐसा संतुलित कानूनी ढांचा विकसित करना चाहिए, जो निजता और पत्रकारिता, दोनों की रक्षा करे।

स्रोतों की सुरक्षा का अर्थ पत्रकारों को जवाबदेही से मुक्त करना नहीं है। यदि कोई पत्रकार जानबूझकर झूठी खबर फैलाने के लिए स्रोत की आड़ लेता है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन जांच की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि ईमानदार स्रोतों का भरोसा न टूटे। स्रोतों की पहचान से जुड़ा डेटा मांगने के लिए स्वतंत्र न्यायिक अनुमति आवश्यक होनी चाहिए। ऐसी मांग का दायरा सीमित और स्पष्ट हो तथा पत्रकारों को उसे चुनौती देने का अधिकार मिले। कानून में जनहित की खोजी पत्रकारिता के लिए स्रोतों की सुरक्षा के स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए।

पत्रकार और स्रोत के बीच भरोसा एक धागे जैसा है, जो बड़ी मुश्किल से बनता है और एक झटके में टूट सकता है। यह भरोसा बचा रहा, तो घोटाले उजागर होंगे, गलत काम रुकेंगे और लोकतंत्र मजबूत होगा। यदि यह टूट गया, तो खबरें केवल सत्ता की विज्ञप्तियां बनकर रह जाएंगी। पत्रकारिता की बुनियाद स्रोतों की सुरक्षा है और इस बुनियाद को बचाना ही लोकतंत्र को बचाना है।

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