भोपाल, 04 नवंबर।
दीवाली रोशनी, खुशियों और उम्मीदों का त्योहार है। बच्चों की आंखों में नए कपड़ों की चमक होती है और घरों में मिठाइयों की खुशबू। लेकिन इस बार महंगाई ने त्योहार की खुशियों पर ग्रहण लगा दिया है। भोपाल से लेकर इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर तक आम परिवारों के सामने सवाल है कि बढ़ते खर्चों के बीच त्योहार कैसे मनाएं। मिठाई, सूखे मेवे, आटा और बेसन की कीमतों में बढ़ोतरी ने पहले से बिगड़े घरेलू बजट पर और बोझ डाल दिया है।
बाजार में काजू, बादाम और पिस्ता खरीदना अब हर किसी के बस की बात नहीं रह गई है। घी, आटा, मैदा और बेसन के बढ़ते दाम रसोई का हिसाब बिगाड़ रहे हैं। जिन घरों में पिछले साल तक पांच किलो मिठाई आती थी, वहां अब दो किलो खरीदने से पहले भी सोचना पड़ता है। उपहार में सूखे मेवे देने की परंपरा सीमित हो रही है और कई परिवार बच्चों के नए कपड़ों तक पर खर्च घटाने को मजबूर हैं। इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर में भी खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों का असर साफ दिखाई दे रहा है। आमदनी स्थिर है, लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं।
महंगाई का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसका असर केवल जेब पर नहीं, भावनाओं पर भी पड़ता है। पूरे साल दीवाली पर नए कपड़े और मिठाइयों की उम्मीद करने वाले बच्चों को जब समझौता करना पड़ता है, तो उनकी निराशा का हिसाब किसी आर्थिक आंकड़े में नहीं लगाया जा सकता। त्योहार कहीं अमीरी और गरीबी के अंतर को और गहरा न कर दें, यह चिंता भी स्वाभाविक है।
कम फसल, आयात लागत और डॉलर की कीमत जैसे कारणों से खाद्य पदार्थ महंगे हो सकते हैं, लेकिन त्योहारों के समय जमाखोरी की आशंका की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। सरकार को बाजार पर निगरानी बढ़ाकर जमाखोरों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। जरूरतमंद परिवारों को सस्ती खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने के उपाय भी किए जाने चाहिए। साथ ही, तिल, मूंगफली और गुड़ से बनी पारंपरिक मिठाइयों को अपनाकर खर्च कम किया जा सकता है।
दीवाली का असली अर्थ महंगे उपहार और मिठाइयां नहीं, बल्कि प्रेम, अपनापन और खुशियां बांटना है। सरकार, व्यापारियों और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि महंगाई किसी परिवार की खुशियां न छीन ले। हर घर में दीया जले और हर चेहरे पर मुस्कान हो, तभी दीवाली सचमुच रोशन होगी।














