नई दिल्ली, 17 जून।
देश की सर्वोच्च अदालत (उच्चतम न्यायालय) ने पिछले 12 वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे बंद आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन के दो संदिग्धों की जमानत अर्जी पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची की अध्यक्षता वाली अवकाशकालीन पीठ (वेकेशन बेंच) ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए यह आदेश पारित किया।
यह याचिका आरोपी मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। अदालती कार्यवाही के दौरान दिल्ली पुलिस ने आरोपियों की रिहाई का कड़ा विरोध करते हुए दलील दी कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने सभी कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही इनकी जमानत खारिज की थी। दिल्ली पुलिस के अनुसार, हाईकोर्ट ने गुलफिशा फातिमा केस के तय सिद्धांतों के आधार पर फैसला सुनाया था। हालांकि, उच्चतम न्यायालय ने इस पर टिप्पणी करते हुए ऐतिहासिक 'केए नजीब' मामले के फैसले का हवाला दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि उस फैसले के मुताबिक, मुकदमे (ट्रायल) में अत्यधिक देरी होना यूएपीए (UAPA) जैसे गंभीर मामलों में भी जमानत देने का एक कानूनी और वैध आधार माना गया है, जो इस मामले पर भी लागू हो सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए।
उल्लेखनीय है कि यह पूरा मामला एक अवैध हथियार और गोला-बारूद बनाने वाली फैक्ट्री के जरिए रची गई कथित आतंकी साजिश से जुड़ा है। दोनों आरोपियों को सुरक्षा एजेंसियों ने साल 2014 में दबोचा था। इसके बाद, साल 2021 में राजस्थान की अदालतों ने उन्हें देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, यूएपीए और आर्म्स एक्ट की विभिन्न संगीन धाराओं के तहत मुजरिम ठहराया था। इसी साल अप्रैल में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी में आतंकी षड्यंत्र रचने के एक अन्य मामले में दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके बाद राहत पाने के लिए दोनों ने देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख किया है।














