कोलकाता, 18 जून।
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में जारी सियासी घमासान के बीच एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) के रूप में मान्यता देने के विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के निर्णय पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ ने इस मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए सभी संबंधित पक्षों को अपना-अपना पक्ष हलफनामे के जरिए पेश करने का हुक्म दिया है। अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई तीन हफ्ते बाद होगी।
यह कानूनी लड़ाई सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका के बाद शुरू हुई। याचिका में स्पीकर पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया कि उन्होंने पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी द्वारा नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम के भेजे गए आधिकारिक प्रस्ताव को दरकिनार कर दिया और बागी रुख अख्तियार करने वाले विधायक ऋतब्रत बनर्जी को इस जिम्मेदारी के लिए मान्यता दे दी।
अदालती कार्यवाही के दौरान माननीय न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष की कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की त्वरित प्रक्रिया पर कई कड़े सवाल दागे। पीठ ने पूछा कि तृणमूल आलाकमान द्वारा भेजे गए पहले प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालकर, कुछ विधायकों द्वारा बाद में भेजे गए दूसरे प्रस्ताव को इतनी जल्दबाजी में स्वीकार करने का क्या औचित्य था? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुख्य कानूनी सवाल यह है कि क्या अध्यक्ष सभी पक्षों का पक्ष जाने बिना एक प्रस्ताव को खारिज कर दूसरे को मंजूरी दे सकते हैं? अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत कहता है कि किसी भी फैसले पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों को सुना जाना अनिवार्य है। केवल कथित जालसाजी के दावों के आधार पर मूल प्रस्ताव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जवाब में विधानसभा अध्यक्ष का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि यह एक बेहद असाधारण और उलझी हुई परिस्थिति थी, जहां एक ही पद के लिए दो परस्पर विरोधी दावे सामने आ गए थे। अध्यक्ष ने माना कि तृणमूल कांग्रेस ही मुख्य विपक्षी दल है, लेकिन उनके सामने यह तय करना जरूरी था कि पार्टी के निर्वाचित विधायकों के बीच किस नेता को वास्तविक बहुमत हासिल है। अध्यक्ष की ओर से कोर्ट को बताया गया कि कुल 80 में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के पक्ष में अपना लिखित समर्थन पत्र सौंपा था और वे व्यक्तिगत रूप से अध्यक्ष के सामने हाजिर भी हुए थे। इसी भारी बहुमत के आधार पर उन्हें मान्यता दी गई।
ऋतब्रत बनर्जी और बागी गुट की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता तिलक बोस ने तर्क दिया कि नेता प्रतिपक्ष का चयन पूरी तरह विधानसभा के भीतर की प्रक्रिया का हिस्सा है। अध्यक्ष के पास यह तय करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है कि किस उम्मीदवार के पास विपक्षी विधायकों का संख्या बल है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में विधायकों का गणित बदलता है, तो अध्यक्ष नया नेता प्रतिपक्ष चुन सकते हैं।
इसके विपरीत, याचिकाकर्ता के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंद्योपाध्याय ने तीखा पलटवार करते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने राजनीतिक दल (पार्टी) और उसके विधायक दल (लेजिस्लेटिव पार्टी) के बीच के बुनियादी कानूनी अंतर को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। उच्चतम न्यायालय के पुराने फैसलों की नजीर देते हुए उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष तय करने का अंतिम अधिकार पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का होता है, न कि विधायक दल के किसी बागी गुट का। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब स्पीकर को ऋतब्रत बनर्जी को पार्टी से बाहर किए जाने की जानकारी पहले ही दे दी गई थी, तो उन्हें इस पद पर कैसे बिठाया जा सकता है? याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि ऐसा हुआ, तो यह संसदीय लोकतंत्र और दलगत अनुशासन की मूल भावना के खिलाफ होगा। फिलहाल, कोर्ट ने अंतरिम रोक न लगाते हुए सभी पक्षों के जवाब मांगे हैं।














