मेदिनीपुर, 18 जून।
पश्चिम बंगाल के दीघा में नवनिर्मित जगन्नाथ मंदिर को लेकर उपजा विवाद सुलझने के बजाय और गहराता जा रहा है। नाम के आगे से 'धाम' शब्द को विलोपित किए जाने के हालिया विवाद के बाद अब इस मामले में पुरी जगन्नाथ मंदिर प्रशासन की ओर से एक और नई और गंभीर आपत्ति सामने आई है।
ओडिशा के पुरी मंदिर के सेवायतों और वरिष्ठ अधिकारियों ने अब यह पुरजोर मांग उठाई है कि दीघा के मंदिर के गर्भगृह में स्थापित पाषाण (पत्थर) की मूर्तियों को वहां से तुरंत विस्थापित किया जाए। उनकी जगह शास्त्रों के नियमों के अनुसार केवल विशेष लकड़ी से निर्मित ‘दारुब्रह्म’ प्रतिमाएं ही प्रतिष्ठित की जानी चाहिए। पुरी के सेवायतों का तर्क है कि संपूर्ण विश्व में कहीं पर भी यदि भगवान जगन्नाथ की आराधना की जाती है, तो वहां पुरी मंदिर की सदियों पुरानी पारंपरिक रीति-नीति और पूजा पद्धति का ही अक्षरशः पालन होना अनिवार्य है।
विदित हो कि पश्चिम बंगाल की पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल के दौरान बनाए गए इस भव्य मंदिर के नाम के साथ 'धाम' शब्द को समाहित किया गया था। इस नामकरण पर ओडिशा सरकार और पुरी की मंदिर प्रबंधन समिति ने कड़ा एतराज जताया था। इस गतिरोध के बाद, राज्य में नवगठित भाजपा सरकार ने हाल ही में मंदिर के नाम से आधिकारिक तौर पर "धाम" शब्द को हटाने का फैसला किया था।
अब इस नए विवाद को लेकर पुरी धाम के सेवायतों का कहना है कि सनातन शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक महाप्रभु जगन्नाथ की विग्रह स्वरूप प्रतिमाएं पत्थर की नहीं बल्कि विशेष काष्ठ (लकड़ी) की ही होनी चाहिए। इसी व्यवस्था से मंदिर की धार्मिक शुचिता और प्राचीन परंपरा अक्षुण्ण बनी रह सकती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में दीघा में रथयात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है, तो उस पावन रथ पर भी सिर्फ लकड़ी से बनी प्रतिमाओं को ही विराजमान कराया जाना चाहिए।
हालांकि, इस विषय पर थोड़ा नरम रुख अपनाते हुए पुरी मंदिर के मुख्य सेवायत स्वेन महापात्र ने अपनी राय दी है कि मुख्य मंदिर के भीतर स्थापित पाषाण विग्रह की नित्य पूजा-अर्चना करने में कोई विशेष पाबंदी या आपत्ति नहीं है, किंतु ऐसी पाषाण निर्मित प्रतिमा को किसी भी सूरत में रथ पर आरूढ़ नहीं किया जा सकता।
दूसरी तरफ, इस पूरे घटनाक्रम के बीच बुधवार की देर शाम दीघा मंदिर के स्थानीय सेवायत गौरहरि प्रधान ने भी इस मत का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने स्वीकार किया कि सनातन काल से ही भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र की प्रतिमाएं लकड़ी से ही तैयार की जाती रही हैं। लिहाजा, पुरी की इस महान और सर्वमान्य धार्मिक परंपरा का निष्ठापूर्वक पालन देश-दुनिया के अन्य सभी जगन्नाथ मंदिरों में भी अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।














