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17 Apr, 2026

अरुणाचल के स्थानों के नाम बदलकर चीन ने फिर जताया दावा, भारत ने किया सख्त विरोध

अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की चीन की कार्रवाई को भारत ने खारिज करते हुए इसे दबाव और विस्तारवादी रणनीति का हिस्सा माना है।

नई दिल्ली, 17 अप्रैल

अरुणाचल प्रदेश में स्थानों के नाम बदलने की चीन की हालिया पहल को भारत ने सख्ती से खारिज किया है, लेकिन यह कदम बीजिंग की भू-राजनीतिक और सांस्कृतिक विस्तार की सोच को उजागर करता है। यह स्पष्ट करता है कि चीन, आर्थिक सहयोग की बात करते हुए भी अपने क्षेत्रीय दावों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा 150 अरब डॉलर से अधिक है, जिसमें हांगकांग के साथ होने वाला व्यापार भी शामिल है।

वर्ष 2017 में डोकलाम गतिरोध के बाद से चीन अरुणाचल प्रदेश के 82 स्थानों और भौगोलिक क्षेत्रों के नाम बदल चुका है, जिसमें 10 अप्रैल 2026 को जारी 23 नए नाम भी शामिल हैं। विदेश मंत्रालय ने दोहराया है कि इस तरह की कार्रवाइयों से वास्तविक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता, लेकिन यह कदम दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता है, जबकि तिब्बत पर उसने 1950 में बलपूर्वक कब्जा किया था, जिसे बाद में भारत की तत्कालीन सरकार ने स्वीकार किया।

देश के भीतर कुछ सेवानिवृत्त और वर्तमान अधिकारी जहां चीन के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने की वकालत करते हैं, वहीं वे भारत-अमेरिका संबंधों की समीक्षा की बात भी करते हैं। हालांकि, चीन द्वारा बार-बार किए जा रहे क्षेत्रीय दावों और सैन्य तथा सांस्कृतिक विस्तार पर वे स्पष्ट जवाब नहीं दे पाते। यह वर्ग चीन और रूस की गलतियों को नजरअंदाज करते हुए अमेरिका की नीतियों की आलोचना करता है। चीन-पाकिस्तान के बढ़ते सैन्य और नागरिक सहयोग को अनदेखा किया जाता है, जबकि अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों को भारत के खिलाफ बताया जाता है।

हालांकि चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने की बात की जाती है, लेकिन पूर्वी लद्दाख में अब तक सैन्य स्तर पर कोई कमी नहीं आई है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी चुंबी घाटी में सक्रिय है और अमूचू नदी के किनारे विस्तार की कोशिश कर रही है, जो सिलीगुड़ी कॉरिडोर के लिए संवेदनशील क्षेत्र है। इसके साथ ही चीन पाकिस्तान को पनडुब्बियां, युद्धपोत और निगरानी जहाज उपलब्ध करा रहा है और उसे लंबी दूरी की मिसाइल प्रणाली विकसित करने में मदद दे रहा है।

मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में हुए सैन्य टकराव के दौरान भारत को किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन नहीं मिला था, जिसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वर्तमान परिस्थितियों में पाकिस्तान के अमेरिका और चीन दोनों के साथ संबंधों को देखते हुए भारत को दो मोर्चों पर संभावित चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। चीन पूर्वी लद्दाख में 1959 की रेखा और अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावों से पीछे हटने के संकेत नहीं दे रहा है।

ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह अपनी रणनीतिक तैयारी को मजबूत करे और चीन के भीतर की गतिविधियों तथा उसकी वैश्विक रणनीति को समझे। भारत को अपने रुख पर कायम रहते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमाओं पर शांति और स्थिरता ही बेहतर संबंधों की पहली शर्त हो, न कि केवल व्यापारिक सहयोग।

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