एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 एनजीओ को मिलने वाले विदेशी चंदे पर कड़ी निगरानी प्रस्तावित करता है, जिससे पारदर्शिता, सरकारी नियंत्रण, संघीय स्वायत्तता और नागरिक स्वतंत्रता पर बहस छिड़ी है।
06 अप्रैल।
भारत में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका लंबे समय से सामाजिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनजागरूकता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रही है। इन्हीं संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 अब एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 ने न केवल प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की संभावना पैदा की है, बल्कि इसके राजनीतिक और संवैधानिक निहितार्थों को लेकर भी व्यापक बहस छेड़ दी है।
सरकार का तर्क है कि देश में लगभग 16,000 संगठन इस कानून के तहत पंजीकृत हैं और हर वर्ष करीब 22,000 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान प्राप्त करते हैं। ऐसे में इन फंड्स का पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना आवश्यक है। सरकार का यह भी कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कुछ प्रशासनिक अस्पष्टताएं हैं, जिनके कारण दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है। प्रस्तावित संशोधन इन्हीं कमियों को दूर करने का प्रयास है।
विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान ‘नामित प्राधिकरण’ की स्थापना से जुड़ा है। इसके तहत यदि किसी संगठन का पंजीकरण निलंबित, रद्द या नवीनीकरण नहीं किया जाता, तो उस संगठन की विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों का प्रबंधन, हस्तांतरण या निपटान यह प्राधिकरण करेगा। इसे सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां दी जाएंगी, जिससे वह संपत्तियों के उपयोग या बिक्री पर निर्णय ले सकेगा। सरकार का मानना है कि पहले ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी, जिससे भ्रम और अनियमितता की स्थिति बनती थी।
हालांकि, यही प्रावधान सबसे अधिक विवाद का कारण भी बना है। आलोचकों का कहना है कि इससे केंद्र सरकार को अत्यधिक शक्तियां मिल जाएंगी, जिनका दुरुपयोग संभव है। किसी भी संगठन की संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण की संभावना लोकतांत्रिक ढांचे में असहजता पैदा करती है, खासकर तब जब वह संगठन सामाजिक या धार्मिक कार्यों से जुड़ा हो।
विधेयक में एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव ‘मुख्य कार्यकर्ता’ की परिभाषा को विस्तारित करने का है। अब केवल पदाधिकारी या निदेशक ही नहीं, बल्कि ट्रस्टी, साझेदार, हिंदू अविभाजित परिवार का कर्ता, संचालन मंडल के सदस्य या संगठन का प्रबंधन करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके दायरे में आएगा। इससे इन सभी पर कानून के उल्लंघन की जिम्मेदारी तय की जा सकेगी, जब तक कि वे अपनी अनभिज्ञता या उचित सावधानी साबित न कर दें। यह प्रावधान जवाबदेही को मजबूत करता है, लेकिन साथ ही यह आशंका भी पैदा करता है कि इससे अनावश्यक कानूनी दबाव बढ़ सकता है।
विधेयक में एक और अहम संशोधन यह है कि अब किसी भी जांच एजेंसी या राज्य सरकार को एफसीआरए से जुड़े मामलों की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होगी। यह प्रावधान संघीय ढांचे के संदर्भ में भी प्रश्न खड़े करता है। आलोचकों का मानना है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है और जांच प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव में आ सकती है।
इसके अलावा, ‘पूर्व अनुमति’ श्रेणी के तहत मिलने वाले विदेशी चंदे के उपयोग के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित करने का प्रस्ताव है, जबकि पहले यह प्रावधान खुला था। साथ ही, पंजीकरण की अवधि समाप्त होने या नवीनीकरण न होने पर प्रमाणपत्र स्वतः समाप्त हो जाएगा। एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में दंड प्रावधानों में भी संशोधन किया गया है, जिसमें अधिकतम कारावास की अवधि पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दी गई है।
गृह मंत्रालय के अनुसार, एफसीआरए का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग देश की आंतरिक सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध न हो। 1976 में पहली बार लागू यह कानून 2010 में नए स्वरूप में आया और इसके बाद कई बार संशोधित किया गया है। पिछले वर्षों में हजारों एनजीओ के पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं, जो यह संकेत देता है कि सरकार इस क्षेत्र में कड़ा नियंत्रण बनाए रखना चाहती है।
लेकिन विधेयक के विरोध में उठ रही आवाजें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि मामला केवल प्रशासनिक सुधार तक सीमित नहीं है। विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों, विशेषकर अल्पसंख्यक संस्थानों ने इसे ‘कार्यपालिका का अतिक्रमण’ बताया है। उनका कहना है कि इससे सरकार को संगठनों के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप का अवसर मिलेगा और उनकी स्वायत्तता प्रभावित होगी।
राजनीतिक स्तर पर भी इस विधेयक को लेकर मतभेद स्पष्ट हैं। कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इसे संघीय ढांचे के खिलाफ बताया है और आशंका जताई है कि इसका इस्तेमाल संस्थाओं की संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जा सकता है। संसद में विपक्ष के विरोध के कारण ही इस विधेयक को फिलहाल टालना पड़ा।
विधेयक का स्थगन इस बात का संकेत है कि सरकार को अभी व्यापक सहमति बनाने की जरूरत है। हालांकि विधेयक अभी भी सक्रिय है और इसे भविष्य में फिर से पेश किया जा सकता है। इस बीच यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह संशोधन वास्तव में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगा या फिर यह नागरिक समाज और सरकार के बीच विश्वास के अंतर को और बढ़ा देगा।
विदेशी चंदे का नियमन निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि इस प्रक्रिया में संतुलन बना रहे। यदि नियंत्रण की प्रक्रिया अत्यधिक कठोर या केंद्रीकृत हो जाती है, तो इससे नागरिक समाज की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, यदि नियंत्रण ढीला हो, तो दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।
इसी संतुलन को साधना इस विधेयक की सबसे बड़ी चुनौती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके कदम पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने वाले हों, न कि नियंत्रण और हस्तक्षेप के प्रतीक बनें। वहीं, नागरिक समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि जवाबदेही से बचने का कोई विकल्प नहीं है।
वर्तमान परिस्थिति में यह विधेयक केवल एक कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि शासन, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की परीक्षा बन गया है। आने वाले समय में इसका स्वरूप और प्रभाव ही तय करेगा कि यह कदम सुधार की दिशा में है या एक नई बहस की शुरुआत।