भारतीय राजनीति में अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी है। धनबल और कम शिक्षा से लोकतंत्र प्रभावित, पारदर्शिता और जागरूक मतदाता आवश्यक। सुधार और जवाबदेही अनिवार्य हैं।
06 अप्रैल।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां राजनीति आदर्शों की बात तो करती है, लेकिन व्यवहार में उन्हीं आदर्शों को सबसे पहले त्याग देती है। चुनावी मंचों पर पारदर्शिता, निष्पक्षता और अपराध-मुक्त राजनीति की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल, जब प्रत्याशियों के चयन की बारी आती है, तो उन्हीं सिद्धांतों को किनारे रख देते हैं। हालिया चुनावी आंकड़े इस दोहरे चरित्र को पूरी तरह उजागर करते हैं और यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या लोकतंत्र की आत्मा वास्तव में सुरक्षित है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार, बड़ी संख्या में ऐसे उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। लगभग 38 प्रतिशत प्रत्याशियों का आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़ा होना केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि करीब 23 प्रतिशत उम्मीदवारों पर हत्या और बलात्कार जैसे गंभीर आरोप हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति अब सेवा का माध्यम न रहकर शक्ति प्रदर्शन का मंच बनती जा रही है।
राजनीतिक दलों की दलील अक्सर यह होती है कि वे “जीतने की क्षमता” के आधार पर उम्मीदवार चुनते हैं। लेकिन यह तर्क लोकतंत्र के मूल्यों के साथ खुला समझौता है। यदि जीत ही अंतिम लक्ष्य बन जाए, तो नैतिकता, ईमानदारी और जनसेवा जैसे शब्द केवल भाषणों तक सीमित रह जाते हैं। सच्चाई यह है कि कई दल जानबूझकर ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देते हैं, जिनके पास धनबल, बाहुबल या सामाजिक समीकरणों को साधने की क्षमता होती है।
धनबल का बढ़ता प्रभाव भी उतना ही चिंताजनक है। आंकड़े बताते हैं कि हर पांच में से दो उम्मीदवार करोड़पति हैं। पिछले चुनावों की तुलना में यह संख्या तेजी से बढ़ी है, जो संकेत देती है कि राजनीति अब आमजन की पहुंच से दूर होती जा रही है। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत समान अवसर का है, लेकिन जब चुनाव लड़ना ही अत्यधिक खर्चीला हो जाए, तो गरीब और मध्यमवर्गीय वर्ग के लिए राजनीति में प्रवेश लगभग असंभव हो जाता है। इससे सत्ता पर एक सीमित, संपन्न वर्ग का वर्चस्व स्थापित होता जा रहा है।
शिक्षा के स्तर पर भी तस्वीर उत्साहजनक नहीं है। आधे से अधिक उम्मीदवार ग्रेजुएट नहीं हैं और बड़ी संख्या में उनकी शिक्षा पांचवीं से बारहवीं के बीच सीमित है। यह तथ्य अपने आप में प्रश्न उठाता है कि क्या नीति-निर्माण जैसे जटिल कार्यों के लिए आवश्यक बौद्धिक और प्रशासनिक समझ इन प्रतिनिधियों में पर्याप्त रूप से मौजूद है। हालांकि लोकतंत्र में शिक्षा को अनिवार्य शर्त नहीं बनाया जा सकता, लेकिन न्यूनतम बौद्धिक क्षमता और जागरूकता की अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए।
सबसे बड़ी समस्या राजनीतिक दलों की कथनी और करनी के बीच का अंतर है। एक ओर वे अपराध-मुक्त राजनीति की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं दलों द्वारा बड़ी संख्या में आपराधिक मामलों में घिरे उम्मीदवारों को टिकट दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और संसद में हुई चर्चाएं भी इस प्रवृत्ति को रोकने में अब तक नाकाम रही हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल कानूनी प्रावधानों की नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की है।
हालांकि इस पूरी स्थिति के लिए केवल राजनीतिक दलों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। मतदाताओं की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब तक जनता ऐसे उम्मीदवारों को चुनती रहेगी, तब तक दल भी उन्हें टिकट देने से पीछे नहीं हटेंगे। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय मतदाता का होता है, और यदि वह अपने मताधिकार का उपयोग जाति, धर्म या तात्कालिक लाभ के आधार पर करेगा, तो सुधार की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।
समाधान स्पष्ट है, लेकिन उस पर अमल करने की आवश्यकता है। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएं। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को टिकट देने से बचना चाहिए और स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देनी चाहिए। साथ ही, मतदाताओं को भी जागरूक होकर अपने निर्णय लेने होंगे और ऐसे उम्मीदवारों को नकारना होगा, जिनका रिकॉर्ड संदिग्ध है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं, बल्कि जनविश्वास का आधार है। यदि इस आधार में ही दरार आ जाए, तो पूरी व्यवस्था कमजोर हो जाती है। अब समय आ गया है कि राजनीति अपने चरित्र का पुनर्मूल्यांकन करे और यह तय करे कि उसे केवल सत्ता चाहिए या जनता का विश्वास भी। यदि यह बदलाव नहीं आया, तो लोकतंत्र का यह दाग और गहराता जाएगा।