ट्रंप की वैश्विक नीतियां और ईरान पर आक्रामक रुख विश्व राजनीति में अस्थिरता बढ़ा रहे हैं। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, शक्ति प्रदर्शन और आक्रामक बयानबाज़ी से तनाव उत्पन्न हुआ है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए रणनीतिक संयम, धैर्य और संतुलित कूटनीति अपनाना आवश्यक है ताकि वैश्विक स्थिरता बनी रहे।
06 अप्रैल।
अमेरिका को अक्सर विरोधाभासों का देश कहा जाता है। एक ओर वह अंतरिक्ष में नई उपलब्धियों के जरिए मानव सभ्यता को आगे बढ़ाता है, तो दूसरी ओर उसकी राजनीतिक भाषा और निर्णय कई बार दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेल देते हैं। हाल के घटनाक्रमों में यह विरोधाभास और भी स्पष्ट हो गया है। जब एक तरफ अमेरिका अंतरिक्ष मिशनों के जरिए अपनी तकनीकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करता है, वहीं दूसरी तरफ उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को “पत्थर युग में भेजने” जैसी आक्रामक बयानबाज़ी करते हैं। सवाल यह नहीं है कि अमेरिका क्या कर सकता है, बल्कि यह है कि वह किस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इतिहास गवाह है कि इस प्रकार की आक्रामक चेतावनियां अक्सर उलटा असर डालती हैं। वियतनाम युद्ध के दौरान भी अमेरिका ने इसी तरह की ताकत का दावा किया था, लेकिन परिणाम उसके विपरीत रहे। आज ईरान के संदर्भ में भी स्थिति उतनी ही जटिल है। यह संघर्ष किसी स्पष्ट रणनीति का परिणाम कम और व्यक्तिगत नेतृत्व की प्रवृत्तियों का अधिक प्रतीत होता है।
ट्रंप की राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और शक्ति प्रदर्शन का तत्व प्रमुख दिखता है। इसी संदर्भ में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का नाम भी लिया जाता है, जिनकी नीतियां भी वैश्विक संतुलन को चुनौती देती रही हैं। जब दो बड़े शक्तिशाली देशों के नेता एक साथ आक्रामक रुख अपनाते हैं, तो यह वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। यह समझना जरूरी है कि ये नेता अपने-अपने देशों की पूरी जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि उनकी व्यक्तिगत नीतियों का प्रभाव व्यापक हो जाता है।
ईरान लंबे समय से मध्य पूर्व में अस्थिरता का कारण रहा है, यह तथ्य स्वीकार्य है। लेकिन ट्रंप का मौजूदा रुख उनके पहले के बयानों से बिल्कुल उलट है, जब वे अमेरिकी हस्तक्षेपों की आलोचना करते थे। सत्ता में आने के बाद उनका दृष्टिकोण बदल गया है, जो यह दर्शाता है कि सत्ता का आकर्षण किस तरह नीतियों को प्रभावित करता है।
यह भी संभव है कि ट्रंप स्वयं अपने निर्णयों को लेकर असमंजस में हों। उनके बयानों में लगातार विरोधाभास देखने को मिल रहा है—कभी वे ईरान की परमाणु क्षमता समाप्त होने की बात करते हैं, तो कभी उसे युद्ध का कारण बताते हैं। कभी वे शासन परिवर्तन की बात करते हैं, तो कभी यह दावा करते हैं कि वह लक्ष्य हासिल हो चुका है। इस तरह की अनिश्चितता वैश्विक राजनीति को और अधिक अस्थिर बनाती है।
स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह संघर्ष एक पारंपरिक सैन्य विस्तार की ओर बढ़ता दिख रहा है। हर असफल कदम अगले, अधिक आक्रामक कदम की भूमिका तैयार करता है। ट्रंप, जिन्होंने कभी “जमीनी सैनिक न भेजने” का वादा किया था, अब उसी दिशा में बढ़ते दिखाई देते हैं। यह “शॉक एंड ऑ” जैसी सैन्य रणनीतियों के प्रति उनके आकर्षण को दर्शाता है।
अमेरिकी लोकतंत्र में राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण के कई संवैधानिक प्रावधान हैं, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में ये संस्थाएं अपेक्षाकृत निष्क्रिय दिखाई देती हैं। ट्रंप के पहले कार्यकाल में व्हाइट हाउस के भीतर कुछ संतुलनकारी तत्व मौजूद थे, लेकिन इस बार उनकी अनुपस्थिति स्पष्ट है। 25वें संशोधन के तहत राष्ट्रपति को अयोग्य घोषित करने की चर्चा जरूर होती है, लेकिन इसके लागू होने की संभावना बेहद कम है।
ट्रंप प्रशासन के भीतर भी मतभेदों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि सार्वजनिक रूप से उनके सहयोगी उनका समर्थन करते दिखाई देते हैं, लेकिन यह मानना कठिन है कि सभी उनकी आक्रामक नीतियों से सहमत होंगे। कुछ निर्णय, जैसे जल आपूर्ति संयंत्रों को निशाना बनाने की धमकी, न केवल गैर-जिम्मेदाराना हैं बल्कि क्षेत्रीय मानवीय संकट को भी जन्म दे सकते हैं।
अमेरिकी कांग्रेस और न्यायपालिका जैसी संस्थाएं भी फिलहाल प्रभावी हस्तक्षेप करती नहीं दिख रहीं। हालांकि आगामी मध्यावधि चुनाव इस स्थिति को बदल सकते हैं। यदि सत्ता संतुलन बदलता है, तो राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों पर अंकुश लग सकता है और यहां तक कि महाभियोग जैसी प्रक्रियाएं भी शुरू हो सकती हैं।
अब प्रश्न यह उठता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को क्या करना चाहिए। ट्रंप की नीतियों से उनके पारंपरिक सहयोगी देश भी असहज हैं। वे न केवल व्यापारिक टैरिफ बढ़ा रहे हैं, बल्कि नाटो जैसे संगठनों से दूरी बनाने की बात भी कर रहे हैं। ऐसे में यूरोप और एशिया के देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे किस तरह संतुलन बनाए रखें।
भारतीय और एशियाई दृष्टिकोण से देखें तो यह समय रणनीतिक धैर्य का है। भारत जैसे देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे किसी भी ध्रुवीकरण से बचते हुए अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दें। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर संतुलित कूटनीति ही सबसे उपयुक्त रास्ता है।
वैश्विक स्तर पर भी यही रणनीति कारगर हो सकती है—टकराव से बचना और समय का इंतजार करना। अमेरिकी संविधान का 22वां संशोधन यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी राष्ट्रपति सीमित समय तक ही सत्ता में रह सकता है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं और नीतियां भी।
यूरोप ने इस मामले में अपेक्षाकृत संयमित रुख अपनाया है। उसने ईरान के साथ सीधे टकराव से दूरी बनाई है और यूक्रेन जैसे मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर द्वारा यथार्थवादी सहयोग की अपील इसी दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
यह मानना गलत होगा कि ट्रंप के कारण अमेरिका और उसके सहयोगियों के संबंध स्थायी रूप से खराब हो जाएंगे। इतिहास बताता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं अंततः संतुलन स्थापित कर लेती हैं। ट्रंप के बाद आने वाला नेतृत्व निश्चित रूप से अमेरिका की वैश्विक छवि को सुधारने का प्रयास करेगा।
आज की चुनौती यह नहीं है कि ट्रंप को कैसे रोका जाए, बल्कि यह है कि उनकी नीतियों के प्रभाव को कैसे सीमित किया जाए। इसके लिए वैश्विक समुदाय को संयम, संवाद और रणनीतिक धैर्य का सहारा लेना होगा। समय के साथ परिस्थितियां बदलेंगी, और यही इंतजार शायद दुनिया के लिए सबसे सुरक्षित विकल्प है।