भोपाल, 06 अप्रैल।
मध्य प्रदेश में सरकारी तंत्र की लापरवाही और प्रबंधन में चूक का एक गंभीर मामला सामने आया है। लगभग 20,000 मेट्रिक टन गेहूं, जिसकी कुल लागत करीब 35 से 36 करोड़ रुपये थी, उसे संरक्षित रखने के लिए 150 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन अंततः यह पूरा गेहूं सड़कर बेकार हो गया।
यह गेहूं 2017 से 2020 के बीच समर्थन मूल्य पर खरीदा गया था, लेकिन तीन वर्षों तक उसकी देखभाल नहीं हुई। परिणामस्वरूप, इसकी गुणवत्ता इतनी खराब हो गई कि यह न इंसानों के खाने के योग्य रहा और न ही पशुओं के चारे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। कई स्थानों पर अनाज काला पड़ चुका है, बोरियां फट रही हैं और गोदामों से तीव्र बदबू उठ रही है।
लैब परीक्षण में यह गेहूं पूरी तरह अनुपयोगी घोषित कर दिया गया। जानकारी के अनुसार, इस दौरान 34 बार कीटनाशक का छिड़काव किया गया, जिससे न सिर्फ अनाज जहरीला हुआ बल्कि गोदाम के आसपास की हवा भी प्रदूषित हुई। क्षेत्रीय प्रबंधक ने चेतावनी दी है कि यदि यह सड़ा गेहूं तुरंत हटाया नहीं गया, तो आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस मामले के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है—गोदाम संचालक, संबंधित अधिकारी या उच्च स्तर पर बैठे वे लोग जिन्होंने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की। जनता के टैक्स के 150 करोड़ रुपये की बर्बादी किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता का स्पष्ट उदाहरण है। जब देश में गरीबों के लिए अनाज की कमी होती है, तब हजारों टन अनाज का सड़ना गंभीर अपराध जैसा प्रतीत होता है।
अब समय आ गया है कि सरकार इस मामले में सख्त कदम उठाए, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनसे वसूली करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस नीति बनाए। अन्यथा “आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया” की कहावत सरकारी तंत्र की पहचान बनी रहेगी।



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