काठमांडू, 01 अप्रैल।
नेपाल के नए बालेन्द्र शाह सरकार ने 1990 के बाद से सार्वजनिक पदों पर रहे नेताओं, उच्च सरकारी अधिकारियों और राजनीतिक नियुक्त अधिकारियों की संपत्तियों की व्यापक जांच शुरू करने की तैयारी की है। यह कदम भ्रष्टाचार नियंत्रण और सुशासन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लिया जा रहा है, और इसके तहत करीब 10,000 लोग जांच के दायरे में आ सकते हैं। इन लोगों में पूर्व प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, उच्च पदस्थ सिविल सेवक और विभिन्न सरकारी निकायों के अधिकारी शामिल हैं।
सरकार ने यह प्रक्रिया कानूनी और व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के लिए 15 दिनों के भीतर एक उच्चस्तरीय संपत्ति जांच समिति गठित करने का निर्णय लिया है। इस समिति में वित्त, राजस्व, कानून और जांच के विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा। जांच को दो चरणों में बांटा गया है। पहले चरण में 2006 से अब तक सार्वजनिक पदों पर रहे व्यक्तियों की संपत्तियों की जांच की जाएगी, जबकि दूसरे चरण में 1990 से 2005 के बीच पद पर रहे व्यक्तियों के मामलों की समीक्षा की जाएगी। इस चरणबद्ध प्रक्रिया से सरकार को अलग-अलग राजनीतिक और प्रशासनिक अवधियों को प्रभावी ढंग से कवर करने का मौका मिलेगा।
नेपाल में सार्वजनिक अधिकारियों पर लंबे समय से अपनी ज्ञात आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप लगते रहे हैं। बड़ी-बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, भूमि सौदों और सार्वजनिक खरीद में भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आ चुके हैं। हालांकि, पूर्व में कई जांच आयोग बनाए गए थे, लेकिन उन आयोगों को अपनी रिपोर्टों को लागू करने में कठिनाई आई और आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। अब, वर्तमान सरकार 1990 के बाद सभी सार्वजनिक पदाधिकारियों की संपत्तियों की व्यापक जांच कर भ्रष्टाचार की जड़ तक पहुंचने के लिए प्रतिबद्ध दिख रही है।
नेपाल पुलिस के केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भी मनी लॉन्ड्रिंग विभाग से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर जांच की तैयारी शुरू कर दी है। ब्यूरो के प्रमुख ने बताया कि सरकार ने ब्यूरो को लिखित निर्देश जारी किए हैं, और जांच प्रक्रिया अब शुरू हो चुकी है। जांच के दायरे में पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा, केपी शर्मा ओली, पुष्प कमल दहल और माधव कुमार नेपाल जैसे प्रमुख नेता भी शामिल हैं। साथ ही, पूर्व मंत्री आरज़ू राणा देउबा और दीपक खड्का भी जांच के दायरे में हैं।
सरकार ने पहले से चर्चा में रहे कई प्रमुख भ्रष्टाचार मामलों की फिर से जांच शुरू करने के संकेत भी दिए हैं। इनमें वाइड-बॉडी विमान खरीद घोटाला, ललिता निवास भूमि घोटाला, फर्जी भूटानी शरणार्थी घोटाला, सोना तस्करी और मेलम्ची परियोजना जैसे मामले शामिल हैं। इन मामलों में से कई पहले भी चर्चा का विषय बने थे, लेकिन अब तक पूरी तरह से सुलझ नहीं पाए हैं, जिससे पुनः जांच की आवश्यकता महसूस हो रही है।
यह निर्णय एक ओर जहां शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की बढ़ती मांग का परिणाम है, वहीं यह नेपाल की नई पीढ़ी के भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाने की अपेक्षाओं के अनुरूप है। सरकार का मानना है कि इस पहल से सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा और भविष्य में ऐसी प्रवृत्तियों को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।












