संपादकीय
03 Apr, 2026

व्यक्तिगत आय पर टैक्स हटाने से तेज हो सकती है देश के विकास की रफ्तार

व्यक्तिगत आयकर समाप्त करने का प्रस्ताव अल्पकालिक उपभोग और निवेश बढ़ा सकता है, लेकिन राजस्व, असमानता और सार्वजनिक निवेश पर दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

नई दिल्ली, 03 अप्रैल।
आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में कर-व्यवस्था केवल राजस्व जुटाने का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक व्यवहार, निवेश प्रवृत्तियों और उपभोग के स्वरूप को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण नीति-उपकरण भी है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ एक ओर तीव्र आर्थिक वृद्धि की आकांक्षा है और दूसरी ओर सामाजिक असमानता तथा सीमित राजकोषीय संसाधनों की चुनौती, वहाँ यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या व्यक्तिगत आय पर टैक्स को समाप्त करने से विकास की गति को और तेज किया जा सकता है। यह विचार पहली दृष्टि में आकर्षक प्रतीत होता है, क्योंकि इससे लोगों की आय में प्रत्यक्ष वृद्धि होगी, उपभोग बढ़ेगा और आर्थिक गतिविधियाँ तेज हो सकती हैं। किंतु इस प्रस्ताव का गंभीर विश्लेषण आवश्यक है, क्योंकि इसके प्रभाव बहुआयामी हैं और केवल सतही लाभों तक सीमित नहीं हैं।
भारत की कर-व्यवस्था पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत आयकर देश के प्रत्यक्ष कर संग्रह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। वर्ष 2023-24 में व्यक्तिगत आयकर का हिस्सा कुल प्रत्यक्ष करों का लगभग 53 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जो 2000-01 के 47 प्रतिशत से उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है। यह केवल आंकड़ों का परिवर्तन नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण, वेतनभोगी वर्ग के विस्तार और कर अनुपालन में सुधार का संकेत है। साथ ही, प्रत्यक्ष करों का जीडीपी में योगदान भी बढ़कर लगभग 6.6 प्रतिशत तक पहुँच गया है, जो पिछले कई वर्षों का उच्च स्तर है। इन तथ्यों से स्पष्ट है कि व्यक्तिगत आयकर सरकार के लिए एक स्थिर और बढ़ता हुआ राजस्व स्रोत है, जिसे अचानक समाप्त करना सरल निर्णय नहीं हो सकता।
फिर भी, इस विचार के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं। पहला और सबसे प्रमुख तर्क यह है कि आयकर हटाने से लोगों के हाथ में अधिक धन आएगा, जिससे उपभोग में वृद्धि होगी। भारत जैसी अर्थव्यवस्था, जहाँ घरेलू उपभोग जीडीपी का बड़ा हिस्सा बनाता है, वहाँ यह प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है। जब मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग के पास अधिक क्रय-शक्ति होगी, तो वे अधिक वस्तुओं और सेवाओं का उपभोग करेंगे, जिससे उत्पादन, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। हाल के वर्षों में भी यह देखा गया है कि कर में छूट या कटौती की संभावनाएँ उपभोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विचाराधीन रही हैं। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो आयकर समाप्त करना एक बड़े प्रोत्साहन पैकेज के समान हो सकता है, जो अर्थव्यवस्था को गति देने में सहायक हो।
दूसरा महत्वपूर्ण तर्क निवेश और उद्यमिता से जुड़ा है। यदि व्यक्तियों पर आयकर का बोझ कम या समाप्त हो जाता है, तो उनके पास बचत और निवेश के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे। यह पूँजी स्टार्टअप, लघु उद्योगों और नवाचार में निवेश के रूप में प्रवाहित हो सकती है। भारत में उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए पहले से ही अनेक नीतिगत प्रयास किए जा रहे हैं, और यदि आयकर हटाने से निजी पूँजी की उपलब्धता बढ़ती है, तो यह आर्थिक विकास को और गति दे सकता है। विशेष रूप से, उच्च आय वर्ग के निवेश निर्णयों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जो पूँजी निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
तीसरा तर्क कर प्रशासन और अनुपालन से जुड़ा है। आयकर व्यवस्था जटिल होती है और इसमें अनुपालन की लागत भी अधिक होती है। यदि व्यक्तिगत आयकर समाप्त कर दिया जाए, तो कर चोरी, रिटर्न दाखिल करने की जटिलता और प्रशासनिक खर्च में कमी आ सकती है। भारत में अभी भी करदाता आधार कुल जनसंख्या का सीमित हिस्सा है—लगभग 6 प्रतिशत लोग ही आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं। ऐसे में यह तर्क दिया जाता है कि एक सीमित आधार पर जटिल कर प्रणाली बनाए रखने के बजाय अन्य स्रोतों से राजस्व जुटाना अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
हालाँकि, इन तर्कों के बावजूद इस प्रस्ताव के गंभीर नकारात्मक पहलू भी हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है—राजस्व की भरपाई कैसे होगी। भारत की कुल कर-से-जीडीपी अनुपात अभी भी लगभग 11.7 प्रतिशत के आसपास है, जो विकसित देशों के 24 से 34 प्रतिशत के औसत से काफी कम है। ऐसे में यदि व्यक्तिगत आयकर को समाप्त कर दिया जाता है, तो सरकार के पास पहले से ही सीमित संसाधन और कम हो जाएँगे। इससे बुनियादी ढाँचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर व्यय प्रभावित हो सकता है, जो दीर्घकालिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू असमानता का है। व्यक्तिगत आयकर एक प्रगतिशील कर होता है, जिसका अर्थ है कि अधिक आय वाले व्यक्ति अधिक कर देते हैं। यह व्यवस्था आय के पुनर्वितरण में सहायक होती है और सामाजिक असमानताओं को कम करने का एक साधन प्रदान करती है। यदि आयकर समाप्त कर दिया जाए, तो उच्च आय वर्ग को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलेगा, जिससे आय असमानता बढ़ने की संभावना है। भारत में पहले से ही आय वितरण में असमानता एक गंभीर मुद्दा है, और ऐसी नीति इसे और गहरा सकती है।
तीसरा पहलू यह है कि आयकर हटाने से सरकार को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ेगी, जो संभवतः अप्रत्यक्ष करों के रूप में होंगे। अप्रत्यक्ष कर, जैसे जीएसटी, सभी उपभोक्ताओं पर समान रूप से लागू होते हैं और अपेक्षाकृत गरीब वर्ग पर अधिक बोझ डालते हैं। यदि राजस्व की भरपाई अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से की जाती है, तो यह कर प्रणाली को अधिक प्रतिगामी बना सकता है, जिससे सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर प्रश्न उठ सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में कर संग्रह की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। 2024-25 में प्रत्यक्ष कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है और यह 22 लाख करोड़ रुपये से अधिक तक पहुँच चुका है। यह संकेत देता है कि कर आधार और अनुपालन में सुधार हो रहा है। ऐसे समय में आयकर को समाप्त करना उस सकारात्मक प्रवृत्ति को बाधित कर सकता है, जो दीर्घकाल में राजकोषीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी इस विषय में मिश्रित संकेत देते हैं। कुछ देशों ने सीमित रूप में आयकर में कटौती या सरलीकरण किया है, लेकिन पूर्ण रूप से समाप्त करने के उदाहरण बहुत कम हैं। अधिकांश विकसित देशों में उच्च कर-से-जीडीपी अनुपात इस बात का प्रमाण है कि मजबूत सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा के लिए कर राजस्व आवश्यक है। भारत जैसे देश, जहाँ अभी भी बुनियादी सेवाओं में सुधार की आवश्यकता है, वहाँ कर राजस्व का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
इस संदर्भ में यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या विकास केवल उपभोग बढ़ाने से संभव है। वास्तविकता यह है कि दीर्घकालिक विकास के लिए निवेश, मानव पूँजी, बुनियादी ढाँचा और संस्थागत सुधार अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। यदि आयकर हटाने से अल्पकालिक उपभोग तो बढ़ता है, लेकिन सरकार के निवेश की क्षमता घट जाती है, तो इसका समग्र प्रभाव नकारात्मक भी हो सकता है। इसलिए इस नीति के प्रभाव को केवल एक आयाम में नहीं, बल्कि समग्र आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है।
समाधान संभवतः इस चरम विकल्प में नहीं, बल्कि संतुलित सुधारों में निहित है। आयकर प्रणाली को सरल बनाना, दरों को तर्कसंगत करना, छूटों को कम करना और अनुपालन को आसान बनाना ऐसे कदम हैं, जो बिना राजस्व को नुकसान पहुँचाए आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। इसके साथ ही, कर आधार का विस्तार, डिजिटल प्रौद्योगिकी का उपयोग और कर प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार के सुधार विकास और राजकोषीय स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित कर सकते हैं।
अंततः, व्यक्तिगत आयकर को पूरी तरह समाप्त करना एक आकर्षक लेकिन जटिल प्रस्ताव है। यह अल्पकाल में उपभोग और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे सकता है, किंतु इसके दीर्घकालिक प्रभाव राजस्व, असमानता और सार्वजनिक निवेश पर गंभीर हो सकते हैं। इसलिए इस विषय पर निर्णय लेते समय भावनात्मक या लोकप्रिय तर्कों के बजाय ठोस आंकड़ों, व्यापक आर्थिक विश्लेषण और दीर्घकालिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देनी होगी। एक जिम्मेदार नीति वही होगी, जो विकास की गति को तेज करने के साथ-साथ सामाजिक न्याय और आर्थिक स्थिरता को भी सुनिश्चित कर सके।
 
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